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हिंदुत्व का कौन-सा चेहरा है यह?

दृष्टिकोण. ved अगर यह हिंदुत्व है तो इससे अधिक शर्मनाक क्या हो सकता है? कौन से हिंदू धर्मग्रंथ में लिखा है कि निहत्थों की हत्या करो, भिक्षुणी से बलात्कार करो, गर्भवती स्त्रियों के पेट चीरो, अनाथ बच्चों के गले काट दो और बूढ़ों की हड्डियां तोड़ दो?

हिंदुत्व के नाम पर ये सब कुकर्म पहले गुजरात में हुए और अब उड़ीसा में हो रहे हैं। यह बहादुरी नहीं, घनघोर कायरता है। आप गोधरा के हत्यारों को आज तक छू नहीं पाए और आपने बेकसूर मुसलमानों के खून से होली खेली। आप लक्ष्मणानंद सरस्वती के हत्यारों पर अभी तक हाथ नहीं डाल सके और बेचारे दलित ईसाइयों को पकड़-पकड़कर मार रहे हैं।

इसमें शक नहीं कि गोधरा और लक्ष्मणानंद हत्याकांड की प्रतिक्रिया अत्यंत तीव्र होनी ही थी, लेकिन यह कैसी तीव्रता है कि अपराधी तो खुलेआम घूम रहे हैं और बेकसूर लोग मारे जा रहे हैं? माओवादी नेता सत्यसायी पांडा ने लक्ष्मणानंद की हत्या का ‘श्रेय’ खुलेआम लिया है और उसने यह भी कहा है कि उनके संगठन का जनाधार ईसाइयों के बीच है और उनके अनुयायियों के दबाव के कारण ही उन्होंने लक्ष्मणानंद की हत्या की है। पांडा ने धमकी दी है कि वह लालकृष्ण आडवाणी, अशोक सिंघल और प्रवीण तोगड़िया की भी हत्या करेंगे।

इन माओवादियों के खिलाफ हिंदुत्ववादियों ने अब तक क्या किया है? उनका रवैया सरकार से भी ज्यादा निकम्मा है। सरकारें अक्षम हैं, भ्रष्ट हैं, वोट बैंक की गुलाम हैं लेकिन हिंदुत्ववादी तो शुद्ध देशभक्त हैं, राष्ट्रवादी हैं, बहादुर हैं तो वे अपनी जान पर क्यों नहीं खेलते? क्यों नहीं वे जंगलों में जाते? क्यों नहीं वे हथियारों का मुकाबला हथियारों से करते? क्यों नहीं वे हत्यारों को मार गिराते?

यदि वे ऐसा करते तो हिंदुत्व के माथे पर लगे कायरता के कलंक को वे धो डालते। लेकिन वे गुजरात दोहरा रहे हैं। उन्होंने उड़ीसा को भी कायरता की प्रयोगशाला बना दिया है। उन्होंने उड़ीसा और कर्नाटक में जो कुछ किया है, उसने हिंदुत्व के चेहरे को पहले से अधिक काला कर दिया है। उनके कारनामों ने लक्ष्मणानंदजी सरस्वती के खून को पानी में बदल दिया है।

लक्ष्मणानंदजी की विलक्षण तपस्या और अप्रतिम बलिदान के बहाने वे भारत में चल रहे अनैतिक धर्मातरण को सदा के लिए रुकवा सकते थे। लेकिन उन्होंने जो मार्ग चुना है, उसके कारण एक वयोवृद्ध हिंदू संन्यासी की जघन्य हत्या हाशिए पर चली गई है और सारे संसार में दंगा पीड़ित ईसाइयों के प्रति सहानुभूति की लहर उठ रही है। बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद इस दंगे से खुद को अलग दिखा रहे हैं और भाजपा उसकी आलोचना भी कर रही है। लेकिन कोई बताए कि ईसाई विरोधी दंगे भाजपाशासित राज्यों में ही क्यों हो रहे हैं?

अगर यह मान भी लें कि राज्य सरकारों ने खुद ये दंगे नहीं भड़काए हैं, तो भी ये वहां ही क्यों भड़के हैं? इन दंगों को दबाने में राज्य सरकारों की अक्षमता का रहस्य क्या है? उससे भी बड़ा रहस्य यह है कि कंेद्र सरकार चुप्पी साधे बैठी है। कर्नाटक और उड़ीसा के ईसाई क्या भारत के नागरिक नहीं हैं? क्या वे केवल इन राज्यों के ही नागरिक हैं? आखिर उनकी रक्षा की जिम्मेदारी किस पर है? क्या राज्य अपना धर्म निभा रहा है?

सच्चई तो यह है कि जो राज्यों की मजबूृरी है, वही कंेद्र की भी है। कोई भी पार्टी मुठ्ठीभर ईसाइयों के लिए विशाल हिंदू वोट बैंक को क्यों बिदकाए? बिदकाना ठीक भी नहीं, लेकिन यह राजनीतिक कायरता है। नेतृत्वहीनता है। अगर सचमुच देश में आज कोई बड़ा नेता होता, तो वह उड़ीसा के दंगाइयों के सामने अपना सीना खोलकर खड़ा हो जाता। वह अपने हिंदू वोट बैंक को बिदकने नहीं देता। वह उसका कायाकल्प कर देता। वह उसका रूपांतरण कर देता।

नेताओं के नाम पर आज हमारे पास भीड़ के पिछलग्गू हैं, वोटों के गुलाम हैं, प्रवाह में बहने वाले तिनके हैं। हमारे पास वो मर्द कहां हैं, जो जमाने को बदल देते हैं? अब तो अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता भी नहीं हैं जिन्होंने कम से कम यह तो कहने की हिम्मत दिखाई थी कि गुजरात में राजधर्म का पालन नहीं हो रहा है। उड़ीसा के ईसाइयों के शिविर में जाकर अब आंसू बहाने वाला भी कोई नहीं है। कायरता और निष्ठुरता के इस समागम का नाम ही हिंदुत्व है क्या? यह हिंदुत्व का कौन सा चेहरा है?

भारत के पक्ष और विपक्ष दोनों का दिवाला पिट चुका है जो उड़ीसा और कर्नाटक में हुआ, उससे बदतर कांग्रेस-शासित असम में हो रहा है। यदि दंगों के कारण उड़ीसा और कर्नाटक की सरकारें बर्खास्त की जाएं तो असम की सरकार भी क्यों नहीं की जाए? असम में बोडो और मुसलमान, असमी और बंगाली तथा भारतीय और बांग्लादेशी आपस में भिड़ गए हैं। इस तिहरे संघर्ष का सार क्या है? क्या यह नहीं कि भारत नामक राज्य का वर्चस्व फीका पड़ गया है?

मणिपुर में हिंदीभाषियों की हत्या और मुंबई में उन्हे मिलने वाली धमकियों का अर्थ क्या है? क्या यह नहीं कि राष्ट्र नामक अवधारणा का ओज मंद पड़ता जा रहा है? अखिल भारतीय राष्ट्र पर क्षेत्रीय राज्य भारी पड़ रहे हैं। प्रतिदिन क्षीण होता हुआ यह भारत परमाणु महाशक्ति बनकर भी क्या कर लेगा? जिसके निर्दोष नागरिकों को अपने जिंदा रहने का भी भरोसा नहीं, वह भारत किसकी रक्षा के लिए बम बना रहा है, अरबों रुपए खर्च करके फौजें खड़ी कर रहा है और भारत को जागरूक बनाने का सपना देख रहा है।

धन्य है महाशक्तिभारत, जिसके प्रधानमंत्री को पोप और निकोलस सरकोजी जैसे लोग उपदेश पिला रहे हैं। क्या शान है इस भारत की कि ब्रिटिश सांसदगण दिल्ली आकर गृहमंत्री को झिड़कियां दे रहे हैं। यह इसीलिए हो रहा है कि राज्य अपने कर्तव्य से विमुख हो रहा है। वह चकाचौंध में फंसा हुआ है। उसे परमाणु सौदे और 9 प्रतिशत की आर्थिक प्रगति के अलावा कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा है।

20 रुपए रोज पर गुजारा करने वाले भारत मां के 80 करोड़ बेटे, आत्महत्या करने वाले हजारों कर्जदार किसान, आए दिन आतंकवाद का शिकार होने वाले निर्दोष नागरिक और सांप्रदायिक हिंसा में मारे जाने वाले लोग उसे दिखाई ही नहीं पड़ते। यदि राज्य अपना काम ठीक से कर रहा होता, तो भारत के हिंदुत्व का, इस्लाम का, ईसाइयत का चेहरा इतना विद्रूप नहीं होता, जितना आज हो गया है।
-लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं।





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