इंदौर.
रेलमंत्री लालूप्रसाद यादव भले ही रेलवे ट्रैक के आसपास जेट्रोफा की खेती न करवा पाए हों, लेकिन उनका यह काम इंदौर के देवी अहिल्याबाई एअरपोर्ट ने कर दिखाया है। एक एनजीओ एनआईसीटी (नेटवर्क फॉर इन्फॉर्मेशन एण्ड कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी) ने एअरपोर्ट की फालतू जमीन पर इसकी फसल लगाने का जिम्मा लिया था।
इसका बड़ा उद्देश्य था जेट्रोफा की फसल को लेकर फैल रही भ्रांतियां तोड़ना। देशभर से खबरें ‘इसकी खेती करना बेकार है’ मिलने के बाद एनजीओ ने यहां फसल उगाने की जिम्मेदारी ली। वैज्ञानिक तरीके से की गई खेती के बाद अच्छे रिजल्ट मिले और एअरपोर्ट को भी बड़ी कमाई हुई।
अब एनजीओ यहां से मिले नतीजों को अपनी लैब में पुख्ता करने के बाद किसानों तक पहुंचाने की तैयारी कर रहा है।
सुरक्षित फसल
जेट्रोफा की खेती के जानकार मनीष शर्मा कहते हैं जेट्रोफा के पौधे की उम्र ३५ वर्ष होती है। इसे एक बार लगाने के बाद अधिक ध्यान देने की जरूरत नहीं होती। गर्मी के दिनों में भी इसकी फसल हरी-भरी रहती है। इतना ही नहीं यह फसल अपने आप में ही सुरक्षित होती है। कीट पतंगे इसे नुकसान नहीं पहुंचाते। पशु-पक्षी भी नहीं खाते हैं इसलिए यह एअरपोर्ट पर उगाने से कोई नुकसान नहीं है।
..और हरियाली छा गई
इंदौर एअरपोर्ट पर काफी जंगल था। अथॉरिटी को इसे साफ करवाने में हर साल १५ लाख रुपए तक खर्च करना पड़ते थे। एअरपोर्ट के पूर्व डायरेक्टर जेम्स डब्ल्यू. नटाल कहते हैं जानवरों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही थी। इससे दुर्घटनाओं की आशंका पैदा हो रही थी। जेट्रोफा का प्रोजेक्ट मिलने के बाद हमने उसे मुंबई मुख्यालय भेजकर अनुमति भी ली। इसके बाद यहां खेती शुरू हुई और एअरपोर्ट परिसर में हरियाली छा गई।
लाभ कमाना उद्देश्य नहीं
हमने 2005 में एअरपोर्ट को प्रोजेक्ट बनाकर दिया था, जिसे उन्होंने मुख्यालय से स्वीकृत कराने के बाद टेंडर निकाले। इस टेंडर प्रक्रिया में हमने सबसे ज्यादा रेट कोट किए थे। फिलहाल 108 में से 40 एकड़ जमीन पर जेट्रोफा का प्लांटेशन किया है। एनआईसीटी के संचालक जितेंद्र चौधरी कहते हैं यह योजना हमने लाभ के लिए हाथ में नहीं ली है।
यहां जमीन की लेवलिंग करने और उसे कृषि योग्य बनाने में संस्था के करीब 35 लाख रुपए तक खर्च हो चुके हैं। इसके अलावा अभी तक हम 10 लाख रुपए एअरपोर्ट को दे चुके हैं। हमारा उद्देश्य जेट्रोफा फसल की टेक्नोलॉजी को उन्नत बनाना है। हम इस दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं। ग्रामीण जेट्रोफा की खेती पारंपरिक ढंग से करते हैं। हम माइक्रोप्स छोड़ने जैसी गतिविधियां करके उत्पादन को कई गुना बढ़ा रहे हैं। इस नई तकनीक को जल्द ही किसानों तक पहुंचाया जाएगा।
तीन साल में 45 लाख की बचत
इंदौर एअरपोर्ट ने बैठे-बिठाए तीन साल में 45 लाख की बचत और 10 लाख की कमाई कर ली है। 2005 में तत्कालीन एअरपोर्ट डायरेक्टर जेम्स डब्ल्यू. नटाल ने एअरपोर्ट पर जेट्रोफा की खेती करने का प्रोजेक्ट मुंबई ऑफिस भेजा था। इसमें इसके तीन बड़े फायदे गिनाए गए थे।
एअरपोर्ट का जंगल साफ करने में लगने वाली बड़ी राशि (15 लाख से ज्यादा) बचाना। एअरपोर्ट के आसपास से पक्षियों को भगाना, क्योंकि जेट्रोफा को कोई पशु-पक्षी या कीड़े मकोड़े नहीं खाते और फालतू जमीन का सही उपयोग। इसके बाद मुंबई ऑफिस ने इसकी स्वीकृति दे दी। अभी यहां 108 एकड़ जमीन में से 40 एकड़ में खेती की जा रही है।
तीन अन्य एअरपोर्ट पर हो रही है खेती
एअरपोर्ट पर खेती का यह इकलौता मामला नहीं है। देश में पंतनगर सहित दो अन्य एअरपोर्ट पर भी खेती की जा रही है। इसकी खेती में कुछ विशेष सावधानियां रखना होती हैं। प्लेन की लैण्डिंग अथवा टेक-ऑफ के दौरान कोई खतरा नहीं हो, इसके लिए खेती रनवे से 150 मीटर दूर की जाती है।