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ऊंची उड़ान अभी बाकी है

ग्वालियर. lady भारतीय वायुसेना में लेडी फायटर पायलट बनना एक महिला के लिए भले ही ख्वाब हो, लेकिन हेलिकॉप्टर और ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट की फ्लाइंग में अपना दमखम दिखा चुकी लेडी पायलट नहीं मानती कि वे योग्यता में पुरुषों के मुकाबले कहीं पीछे है।

उनका एक ही सवाल है-जब कई देशों की वायुसेना में महिलाएं फायटर उड़ा रही हैं तो वे क्यों पीछे रहे? सशस्त्र सेनाओं में महिलाओं को स्थायी कमीशन देने के जिस प्रस्ताव को पिछले महीने केंद्र सरकार ने हरी झंडी दिखाई है, उसमें भी भारतीय वायुसेना में महिलाओं का दायरा सीमित कर दिया गया है। इस प्रस्ताव में भी मोटे तौर पर सरकार ने महिलाओं को ग्राउंड डच्यूटी के अलावा ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट एवं हेलिकॉप्टर की फ्लाइंग के लिए स्थायी कमीशन देने पर रजामंदी जताई है।

फाइटर और फंट्रलाइन ऑपरेशन से अब भी महिलाओं को दूर ही रखा गया है। इसके लिए 2006 में हुए उस अध्ययन को आधार बनाया गया है, जिसमें कहा गया है कि दुश्मन से सीधे मुकाबले की स्थिति में महिलाओं को फाइटर की जिम्मेदारी देना उचित नहीं होगा। इसके अलावा कुछ शारीरिक कारण भी गिनाए गए हैं। एयर चीफ मार्शल फली होमी मेजर का कहना है कि इस प्रस्ताव पर वायुसेना गंभीर है। इसे लेकर सभी पहलुओं पर अध्ययन किया जा रहा है। यह अलग बात है कि अधिकांश लेडी पायलट की नजर में केवल इन कारणों के आधार पर उन्हें फंट्रलाइन ऑपरेशन से दूर रखना तर्कसंगत नहीं है।

आखिर मौका क्यों नहीं?
वायुसेना के एक आला अधिकारी के मुताबिक ऐसा नहीं है कि लेडी पायलट शारीरिक योग्यताओं में कहीं पिछड़ रही है। एक फाइटर पायलट के लिए जिन 20 शारीरिक योग्यताओं में कम से कम 17 में हाई एवरेज स्कोर होना चाहिए, उनमें से अधिकांश लेडी पायलट का परफोरमेंस हाईलेवल का रहा है। उन्हें यह मौका दिया जाए या नहीं, यह फैसला वायुसेना से ज्यादा सरकार के रुख पर निर्भर करता है।

एक पायलट की ट्रेनिंग पर कम से कम 15 करोड़ रुपए का खर्च होने के साथ 7 से 8 साल की नियमित ट्रेनिंग की जरूरत होती है। ऐसे में एक लेडी पायलट के लिए यह गारंटी देना जरूरी है कि ट्रेनिंग पीरियड में वह ब्रेक नहीं लेगी। अमेरिका वायुसेना में जहां लेडी फायटर पायलट बखूबी काम कर रही हैं, वहां उनको एडवांस फाइटर एयरक्राफ्ट का पायलट बनने के लिए इस बात की लिखित सहमति देनी पड़ती है कि ट्रेनिंग पीरियड में वह गर्भधारण नहीं करेगी।

समय लगेगा, मगर नाउम्मीदी नहीं
वायुसेना के रिटार्यड ऑफिसर का कहना है कि लेडी पायलट को फाइटर चलाने की अनुमति देने में वक्त लग सकता है, लेकिन इसे लेकर नाउम्मीदी नहीं होनी चाहिए। दूसरे देशों के उदाहरण भी काफी महत्वपूर्ण है। जर्मनी में लेडी पायलट की ट्रेनिंग 1976 में शुरू हो गई थी, लेकिन फाइटर चलाने की अनुमति 1993 में दी गई। जर्मनी में हालांकि अब भी गिनी-चुनी ही लेडी फाइटर पायलट हैं, लेकिन वे एडवांस फाइटर एफ-16 उड़ा रही हैं। इसका श्रेय वहां की 23 फाइटर स्क्वाड्रन की कैप्टन जेसिका रायने को जाता है।

प्रोत्साहन में कमी नहीं
वायुसेना के अधिकारियों का कहना है कि जब से फ्लाइंग ब्रांच में लेडी ऑफिसरों की भर्ती शुरू की गई है, उन्हें धीरे-धीरे हेलिकॉप्टर से लेकर ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट उड़ाने के मौके दिए जाते रहे हैं। इसलिए फाइटर को लेकर भी महिलाओं को आशान्वित रहना चाहिए। मौजूदा मौकों में विस्तार के सवाल पर वायुसेना के प्रवक्ता विंग कमांडर महेश उपासनी का कहना है कि कई लेडी पायलट अनुभव के आधार पर एडवांस ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट आईएल-76 भी उड़ा रही हैं।

यहां हैं सुनहरी मंजिल
राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त कर चुकी फ्लाइंग ऑफिसर हर्षिता भटनागर वायुसेना एकेडमी हैदराबाद में एयरोनोटिकल ब्रांच में ट्रेनिंगरत हैं। उनका कहना है कि भारतीय वायुसेना की तकनीकी शाखा में जाने का अर्थ विश्व की सर्वाेत्तम टेक्नोलॉजी युक्त विमानों और हथियारों से साक्षात्कार है। वह बताती हैं कि एकेडमी में उन्हें इलेक्ट्रोनिक नेटवर्किग से लेकर हवाई जहाज उड़ाने तक के हर पहलू से अवगत कराया गया। इसके अतिरिक्त वायुसेना अपने अफसरों के लिए महंगे शौक जैसे गोल्फ, पोलो आदि के स्वार्णिम अवसर भी प्रदान करता है। सफल कैरियर बनाने के साथ देश सेवा के लिए भारतीय वायुसेना एक सुनहरी मंजिल बन सकता है।

वायुसेना में महिलाएं
1992: पहली बार महिलाओं की तकनीकी व शिक्षा ब्रांच में भर्ती की रिक्तियां निकाली गई। करीब 20 हजार से ज्यादा आवेदन आए। तीन स्थानों पर लिखित व शारीरिक परीक्षा हुई, लेकिन केवल 13 महिलाएं ही चयनित हो सकीं।
1993: 12 जून को शिक्षा व प्रशासनिक ब्रांच में पहली महिला अधिकारी को नियुक्ति मिली।
1994: 17 दिसंबर को पायलट के तौर पर पहली महिला अधिकारी को कमीशन मिला।

वायुसेना में कितनी महिलाएं
इस समय वायुसेना में 793 महिला अधिकारी हैं, जिनमें 63 फ्लाइंग ब्रांच में हैं। शेष सभी महिलाएं ग्राउंड डच्यूटी के अलावा शिक्षा और तकनीकी ब्रांच में कार्यरत हैं। फ्लाइंग ब्रांच की महिला पायलट ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और हेलिकॉप्टर उड़ा रही हैं। इनमें एएन-32 व अन्य हेलिकॉप्टर शामिल है।

हवाई सेवाओं से महिलाओं का लंबा इतिहास

भारत में महिलाओं का हवाई सेवाओं से जुड़ाव का लंबा इतिहास रहा है। कुछ रोचक पहलू-
पायलट का लाइसेंस: 1930 में उर्मिला के पारिख ने देश की पहली महिला पायलट का लाइसेंस हासिल किया।
कॉमर्शियल पायलट: 1947 में पहली बार प्रेम माथुर देश की पहली कॉमर्शियल पायलट बनीं।
इंडियन एयरलाइंस में पायलट: 1956 में दुरबा बैनर्जी इंडियन एयरलाइंस की पहली महिला पायलट बनी।
एयर वाइस मार्शल: वायुसेना में 2002 में चिकित्सा सेवाओं से जुड़ी पी.बंदोपाध्याय पहली ऐसी महिला अधिकारी बनी, जिन्हें एयर वाइस मार्शल के पद पर पदोन्नति मिली।
जान गंवाई: 24 मार्च 1996 को पायलट शैफाली चौधरी ने अपनी डच्यूटी को बखूबी अंजाम देते हुए ब्रrापुत्र में डूब रहे अपने साथी को बचाने के लिए जान गंवा दी।
कारगिल में जलवे: 1999 में कारगिल ऑपरेशन के दौरान पहली बार पायलट गुंजन सक्सेना व श्रीविद्या राजन को वार जोन में उड़ान का मौका मिला।





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