Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood परदे के पीछे .
अतुल अग्निहोत्री की फिल्म ‘हैलो-वन नाइट एट ए कॉल सेंटर’ 10 अक्टूबर को प्रदर्शित होने जा रही है। यह चेतन भगत के उपन्यास पर आधारित फिल्म है और यह कहा जाता है कि इस पुस्तक की बिक्री लाखों की संख्या में हुई है। युवा पाठक वर्ग में किताब बहुत चाव से पढ़ी गई है।
शाइनिंग इंडिया के दम-खम वाले युवा वर्ग ने नए क्षेत्रों में सफलता अर्जित की है और इस वर्ग के पाठकों के मनपसंद उपन्यासकार हैं चेतन भगत, जिनकी ‘फाइव प्वाइंट समवन’ से प्रेरित फिल्म राजकुमार हीरानी बना रहे हैं और इसकी शूटिंग आमिर और करीना लद्दाख में कर रहे हैं। छोटे-बड़े शहरों में कॉल सेंटर में लाखों युवा लोग काम कर रहे हैं।
अतुल अग्निहोत्री ने निहायत ही रोमांचक फिल्म गढ़ी है। मुद्दा यह है कि क्या उपन्यास के लाखों पाठक और कॉल सेंटर में काम करने वाले असंख्य लोग इस फिल्म को देखेंगे? क्या फणीश्वरनाथ रेणु की ‘तीसरी कसम’ उर्फ मारे गए गुलफाम के लाखों पाठकों ने इसी लघुकथा पर रचित शैलेंद्र की फिल्म ‘तीसरी कसम’ देखी थी?
क्या शरतचंद्र के करोड़ों पाठकों ने भंसाली या विमलराय की ‘देवदास’ देखी है? क्या साहित्य आधारित सिनेमा को पढ़ने वाले दर्शक भी मिलते हैं? क्या मेरे इस लोकप्रिय कॉलम के दस प्रतिशत पाठकों ने भी इसके संकलन और मेरे उपन्यास ‘दरबा’ और ‘ताज बेकरारी का बयान’ खरीदी है?
यह समझना कठिन है कि सार्थक फिल्मों के लिए संपादक के नाम पत्र लिखने वाले असंख्य लोग सार्थक फिल्म देखने क्यों नहीं जाते। आज अवाम भारत के भ्रष्ट नेताओं और दुष्ट अफसरों से सख्त नाराज है परंतु दो बॉय दो के मतपत्र कक्ष में ये ही गला फाड़कर विरोध करने वाले लोग जाति के आधार पर मत क्यों डालते हैं? सारा समय सड़क पर हुल्लड़ करने वालों की आलोचना करने वाले लोग इनका सक्रिय विरोध क्यों नहीं करते या इनको पालने वाले राजनैतिक दल के खिलाफ मत क्यों नहीं देते?
आज मुंबई का मराठी मानुस भी आए दिन हुल्लड़ मचाने वालों से खफा है परंतु इनके खिलाफ मत क्यों नहीं देता? हम विचारवान लोग इतने निष्क्रिय क्यों हैं? अच्छाई की ताकतें संगठित क्यों नहीं होतीं? सरोज कुमार का कहना है कि अखबारों में अच्छे लोगों को नायक बनाकर क्यों नहीं प्रस्तुत किया जाता।
अखबार के सारे कॉलम बुरी खबरों से रक्त रंजित क्यों हैं? दरअसल दुनिया में आज भी अच्छे लोगों की संख्या अधिक है परंतु मुट्ठी भर हिंसक लोग उन्हें भयभीत कर देते हैं। गांधीजी ने अपने आंदोलन का शंखनाद ही इस बात से किया था कि निडर हो जाओ। नेहरूजी ने लिखा था कि डर का हौव्वा डर के यथार्थ से भयावह होता है।
हम अंधेरे में रस्सी को सांप समझकर उसके काटने के भय से मर जाते हैं और पोस्टमार्टम में जहर नहीं मिलता। अच्छे लोग, संवेदनशील पाठक और जागरूक फिल्म दर्शक हाथी की तरह होते हैं। उनके खाने और दिखाने के दांत अलग होते हैं। मि. चेतन भगत आश्चर्यचकित मत होना अगर आपके सारे पाठक अतुल अग्निहोत्री की फिल्म देखने ना आएं? वे शायद आएंगे!