रतन टाटा के साहस की दाद दी जानी चाहिए कि उन्होंने अपनी लखटकिया कार के उत्पादन का अंतिम ठिकाना पश्चिम बंगाल में सिंगूर से बदलकर गुजरात के साणंद का कर दिया। टाटा चाहते तो पहले दिन से ही अपने प्रोजेक्ट के लिए मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की खोज कर सकते थे क्योंकि मुंबई स्थित टाटा हाउस और गांधीनगर के बीच उतनी दूरी नहीं है जितनी कि महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के बीच है।
रतन टाटा सिंगूर इसलिए नहीं गए थे कि वहां की जमीन पर बनने वाली नैनो को किसी वामपंथी इंजन से चलाया जाना था या कि उसमें कम ईंधन की खपत होती और वह ज्यादा दूरी तय करती। रतन टाटा सिंगूर शायद इसलिए गए थे कि वे बुद्धदेव भट्टाचार्य को देश का एक श्रेष्ठ मुख्यमंत्री और निजी मित्र मानते हैं।
गुजरात पहुंचने के बाद भी रतन टाटा को भट्टाचार्य के प्रति अपने विश्वास पर कायम रहने का पूरा-पूरा हक है। सारी दुनिया जानती है कि टाटा को सिंगूर में टिकाए रखने के लिए भट्टाचार्य ने क्या-क्या नहीं किया। सिंगूर का चयन करते समय रतन टाटा के सामने शायद यह मजबूरी भी रही होगी कि उन्हें दूर-दूर तक ऐसी कोई जमीन नहीं दिखाई दे रही थी जहां कि यूपीए की हुकूमत हो या कि भाजपा की नहीं हो।
सिंगूर में नैनो की आधारशिला का नारियल फोड़ते वक्त कांग्रेस और वामपंथियों के बीच हनीमून भी ठीक-ठाक चल रहा था। किसी भाजपा-शासित राज्य में नैनो ले जाकर टाटा नई दिल्ली को कोई विपरीत संकेत देने की इच्छा भी नहीं रखते होंगे।
‘बट थैंक्स टू ममता’ के अंदाज में नैनो वहीं पहुंच गई जहां कि उसे पहली नजर में ही पहुंचना था। सिंगूर से बाहर निकलने के बाद रतन टाटा के सामने विकल्प यही बचा था कि वे किसी भाजपा-शासित राज्य में ही जाएं। कर्नाटक, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान शेष ठिकाने थे।
टाटा ने भाजपा-शासित राज्यों में अंतत: गुजरात और नरेंद्र मोदी का चयन पंद्रह मिनट में कर लिया। गुजरात पहुंचने पर नैनो के मूल्य में तो कोई इजाफा नहीं होगा पर गुजरात की सड़कों पर नरेंद्र मोदी की कीमत कार के उत्पादन शुरू होने से पहले ही काफी बढ़ गई है।
मोदी को इस बात से कम फर्क पड़ता है कि अमेरिकी सरकार उन्हें अपने यहां प्रवेश करने का वीजा देती है या नहीं पर न्यू जर्सी में बसने वाले गुजरातियों के नैनो प्रेम पर किसी जॉर्ज बुश का फतवा नहीं चलेगा, यह सिद्ध हो गया है।
अपने पूंजी निवेश के लिए भारत में जमीन और उपभोक्ताओं की तलाश कर रहे अमेरिकियों के लिए कड़ुआ सच यही है कि गुजरात और नरेंद्र मोदी के बिना उनका काम नहीं चल सकता। रिलायंस और एस्सार जैसी बड़ी कंपनियों के साथ ही औद्योगिक प्रगति का जो साम्राज्य आज गुजरात में उपस्थित है उसके पीछे शायद सबसे बड़ा कारण वही है जिसकी कि बयानी करते समय रतन टाटा ने अपनी जुबान पर कहीं गैप नहीं आने दिया कि ‘मोदी जो कुछ कहते हैं वह हो जाता है।’
देश में ऐसे मुख्यमंत्रियों की कमी नहीं होगी जो मोदी के फैशन को अपनी स्टाइल में ढालने की हार्दिक इच्छा तो रखते हैं पर ऐसा कर नहीं पाते। कारण साफ है कि अपने हर नए कैट वाक के साथ मोदी की स्टाइल और फैशन बदल जाता है पर लोग उनके धीर-गंभीर चेहरे के भावों को पढ़ने में ही उलझकर रह जाते हैं।
गुजरात की उपलब्धि भाजपा-शासित राज्यों के उन अन्य मुख्यमंत्रियों के लिए भी संदेश है जो अपने यहां देशी कम और विदेशी ज्यादा निवेश की लालसा से नगरी-नगरी, द्वारे-द्वारे भटकते रहते हैं और अंत में मंत्रियों और अधिकारियों के मोटे-मोटे टूर बिलों के अलावा कुछ हाथ नहीं लगता।
मुख्यमंत्रियों को अपने नौकरशाहों की टीम केवल इस बात का अध्ययन करने के लिए गांधीनगर रवाना करनी चाहिए कि प्रतिवर्ष साढ़े तीन लाख कारें बनाने वाले दो हजार करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट और उसके लिए मुहैया कराई गई ग्यारह सौ एकड़ जमीन किस तरह की ‘तत्काल सेवा’ के तहत बिना किसी ममता-माया के तुरंत क्लीयर हो गई।
देश में और विदेशों में एक बहुत बड़ी लॉबी सक्रिय है जो गुजरात को गोधरा कांड के श्राप से ही अभिशप्त देखना चाहती है। रतन टाटा की नैनो के गुजरात पहुंचने को गुजरातियों के उस गौरव की वापसी के रूप में भी लिया जा सकता है जिसके कि वे हकदार हैं और जिसकी कि आधारशिला कोई सौ वर्ष पूर्व जमशेदजी टाटा ने हजार रुपए की मदद के जरिए रखी थी।
जमशेदजी द्वारा दिए गए वे हजार रुपए ही गुजरात ने रतन टाटा को ब्याज सहित ग्यारह सौ एकड़ जमीन के रूप में वापस किए हैं। नरेंद्र मोदी को एक राष्ट्रीय नेता के रूप में नैनो का क्या फायदा मिलने वाला है वह तो देश में भाजपा का भविष्य ही तय करेगा।