उज्जैनभगवान महाकाल की नगरी उज्जैन के समीप एक गांव ऐसा भी है, जहां शिव भक्त लंकापति रावण की पूजा रोज की जाती है। अलबत्ता, ग्रामीणों में श्रद्धा के साथ ही घृणा का भाव भी इतना अधिक है कि वे हर साल दशहरे पर रावण के पुतले का दहन भी जरूर करते हैं।
अनहोनी के भय और श्रद्धा के कारण रावण की पूजा करने और घृणा के साथ उसका पुतला जलाने का यह विरोधाभास उज्जैन शहर से लगभग १५ किमी दूर चिकली गांव में देखने को मिलता है।
पूजन-दहन न करने पर आईं विपत्तियां
ग्रामीणों का दावा है कि रावण की पूजन और दहन नहीं करने पर गांव में विपत्तियां आ चुकी हैं। दशहरे पर एक बार पुतला दहन नहीं किया तो एक गुस्सेल सांड ने गांव में कई लोगों को चोट पहुंचाई। एक अन्य मौके पर भी पूजन और दहन न होने पर गांव में आग लग गई और काफी नुकसान हुआ।
रोज होती है रावण की पूजा
गांव में चौपाल व मंदिर के निकट रावण की एक प्रतिमा खुले में स्थापित है। मंदिर में पूजा करने के बाद रावण की भी पूजा की जाती है। पहले प्रतिमा मिट्टी की थी, जिसे पांच साल पहले सीमेंट की बना दी गई। गांव में यह मान्यता भी है कि बीमार बच्चे की मां रावण की प्रतिमा के दर्शन कर नारियल की मन्नत मांगे तो बच्च जल्दी ठीक हो जाता है।
हमारे गांव को रावण का गांव कहा जाता है। यदि हम रावण की नियमित पूजन और दशहरे पर दहन न करें तो गांव में विपत्ति आ जाती है। ऐसा पहले कई बार हो चुका है।
- बहादुरसिंह आंजना, स्थानीय निवासी