इंदौर. स्कूल शिक्षा विभाग भी अब सामान्य प्रशासन की तरह कई काम पब्लिक प्रायवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) पर करने जा रहा है। इसके तहत अगले एक साल में हेडस्टार्ट सहित विभाग की कई योजनाएं प्रायवेट सेक्टर के हाथों में होंगी। इस प्रोजेक्ट के बाद प्रदेश के एक लाख आठ हजार से ज्यादा स्कूलों का उपयोग शिक्षा के अलावा निर्धन वर्ग को रोजगारमूलक प्रशिक्षण और अन्य गतिविधियों के लिए भी हो सकेगा।
बुधवार को शहर आए राज्य शिक्षा केंद्र आयुक्त मनोज झालानी ने भास्कर से चर्चा करते हुए बताया पीपीपी पर काम देने से बेहतर परिणाम सामने आएंगे। स्कूल भवन के रूप में जो संसाधन हमारे पास उपलब्ध हैं, उसका लाभ अन्य वर्गो को भी मिल सकेगा। हाल ही में जो आंकड़े आए हैं, उसमें साफ हुआ कि हायर सेकंडरी एजुकेशन के लिए पर्याप्त स्कूल नहीं हैं। इसीलिए शासन ने कई स्कूलों को उन्नत किया है। अगले दो साल में छह हजार हायर सेकंडरी स्कूल बनना हैं।
इसमें साढ़े तीन हजार नवोदय और उत्कृष्ट की तरह होंगे। ढाई हजार स्कूल पीपीपी के माध्यम से बनेंगे। इसके लिए कुछ बड़े समूहों को योजना में शामिल करेंगे। शर्त यह होगी कि वे स्कूल बनाकर देंगे तो अगले 20 साल तक भवन और स्थान का उपयोग वे रोजगारमूलक प्रशिक्षण देने सहित अन्य कार्यो के लिए कर सकेंगे।
कई योजनाएं निजी क्षेत्र को
श्री झालानी ने बताया पहले चरण में हेडस्टार्ट, वोकेशनल ट्रेनिंग, ई-लर्निग जैसी योजनाओं का संचालन निजी क्षेत्र को सौंपने पर विचार किया जा रहा है।
‘भारत सक्सेस योजना’
जिला शिक्षा विभाग और जिला शिक्षा केंद्रों पर स्टाफ की कमी के संबंध में आयुक्त ने कहा केंद्र सरकार द्वारा ऐसी ही समस्याओं के निदान के लिए एक योजना शुरू की जा रही है। ‘भारत सक्सेस योजना’ में संसाधनों को लेकर आने वाली समस्याओं का निदान हो सकेगा।
पीपीपी के फायदे
>> सरकारी संसाधनों का उपयोग हो सकेगा।
>> सरकार पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ कम होगा।
>> जिला शिक्षा केंद्रों में काम कर रहे स्टॉफ को मानिटरिंग का समय मिल सकेगा।
>> शिक्षक सिर्फ शैक्षणिक कार्य कर सकेंगे।
नुकसान
>> निजी शिक्षा का विरोध कर रहे संगठन फिर लामबंद होंगे।
>> एजेंसियां प्रोजेक्ट लेने के बाद आम आदमी पर कितना ध्यान देंगी और व्यावसायिक लाभ कितना कमाएंगी, इसका आकलन मुश्किल।
>> नि:शुल्क शिक्षा की जगह हर महीने फीस चुकाना पड़ सकती है।