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मार्क्‍सवादियों के गढ़ से अब गांधी के गढ़ में नैनो

सिंगूर से छोटी कार नैनो की फैक्ट्री हटा लेने के रतन टाटा के निर्णय पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने इस स्थिति के लिए विपक्षी दल के गैर जिम्मेदाराना रवैए को जिम्मेदार ठहराया।

2006 में सिंगूर में नैनो कार के उत्पादन की घोषणा के बाद जमीन अधिग्रहण का मुद्दा उठाकर तृणमूल कांग्रेस की नेत्री ममता बनर्जी ने आंदोलन शुरू कर दिया। पश्चिम बंगाल में पिछले छह दशकों का किसान-मजदूर आंदोलनों का अत्यंत हिंसक इतिहास रहा है और उसी नक्शेकदम पर ममता का नैनो विरोधी आंदोलन जारी रहा।

2007 के मार्च में तो विरोध प्रदर्शन कर रहे ममता के समर्थकों ने बम विस्फोट और अन्य हिंसक कार्रवाई से नैनो फैक्ट्री के कुछ हिस्से को भी नुकसान पहुंचाया। इसके बाद जिद पर अड़ी ममता को मनाने के लिए गवर्नर से लेकर मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य सहित कोलकाता के व्यापार व उद्योग-मंडलों ने खूब प्रयास किए, लेकिन अपनी बात पर ममता बनर्जी के अडिग रहने की वजह से टाटा मोटर्स को पश्चिम बंगाल से विदा होना पड़ा।

पश्चिम बंगाल में औद्योगीकरण को रोकने वाले ममता बनर्जी के इस हिंसक आंदोलन की प्रशंसा नहीं की जा सकती। रतन टाटा-जैसे प्रतिष्ठित उद्योगपति को पश्चिम बंगाल से बाहर निकल जाने का गलत संदेश पूरी दुनिया में गया है। अब नए उद्योगपति और निवेशक यहां आने से पहले सौ बार सोचेंगे। जब मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य बार-बार यह कहते रहे कि नए औद्योगीकरण के बगैर रोजगार के नए अवसर पैदा करना असंभव है, ऐसे में ममता द्वारा पैदा की गई स्थिति की वजह से राज्य को भारी नुकसान होने वाला है। राज्य के विकास के मार्ग में अवरोध पैदा करने वाली ममता बनर्जी पर आज चौतरफा हमले किए जा रहे हैं।

हकीकत में सिंगूर और उससे पहले नंदीग्राम में भूमि अधिग्रहण के मामले में जो हिंसक विरोध किया गया, उसके पीछे पिछले छह दशकों से चल रही मार्क्‍सवादियों की कार्यशैली ही जिम्मेदार है। 1947 में जब भारत आजाद हुआ तब उद्योग और व्यापार के तीन मुख्य केन्द्र थे - मुंबई, कोलकाता और मद्रास। मुंबई और मद्रास (चेन्नई) ने अपना स्थान कायम रखा है, जबकि कोलकाता यह नहीं कर सका।

इसके लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो वह सिर्फ और सिर्फ पिछले छह दशकों की मार्क्‍सवादियों और अन्य वामपंथियों की कार्यशैली है। 50 का दशक खत्म हो उससे पहले ही पश्चिम बंगाल में वाम दलों द्वारा चलाए जा रहे मजदूर आंदोलनों की वजह से उद्योग वहां से हटने लगे थे। कोलकाता और दमदम सहित बाकी औद्योगिक इलाकों में हड़ताल, घेराव और खून-खराबे के लंबे दौर की वजह से अंग्रेजी शासन के दौरान वहां स्थापित हुए उद्योग भागने लगे और नए उद्योग आए नहीं। मार्क्‍सवादियों और अन्य वाम दलों के इस अतीत को देखते हुए सिंगूर और नंदीग्राम के मामले में ममता ने मार्क्‍सवादियों के विरुद्ध उन्हीं के तौर-तरीके आजमाए।

दशकों तक हिंसक किसान-मजदूर आंदोलनों से ग्रस्त रहे पश्चिम बंगाल में मार्क्‍सवादी और उनके साथी वाम दल पिछले 30 सालों से शासन करने में सफल रहे हैं। इन वर्षो में उन्होंने भूमि सुधार जैसे कानूनों की मदद से किसानों को न्याय दिलाया है, इस बात को भी स्वीकार करना पड़ेगा। नए रोजगार पैदा करने के लिए नए उद्योग आज की सबसे बड़ी जरूरत है और नया उद्योग हवा में तो लगेगा नहीं। लेकिन जिन हिंसक भूमि आंदोलनों की वजह से मार्क्‍सवादी अब तक सफल होते आए हैं, ममता उसी मार्ग पर चलकर आज वाम दलों के मार्ग का रोड़ा बनने में सफल हुई हैं।

महात्मा गांधी के साधनशुद्धि सिद्धांत का मजाक करने वाले मार्क्‍सवादियों को अब देर से ही सही, लेकिन इस बात को स्वीकार करना होगा कि जिन हिंसक किसान-मजदूर आंदोलनों के बल पर वे सत्ता पर काबिज होते आए हैं, उसी हथियार का उपयोग उनकी प्रतिस्पर्धी ममता बनर्जी भी सफलता के साथ कर सकती हैं। ममता ने पश्चिम बंगाल की छवि को नुकसान पहुंचाया है इस बात से इनकार नहीं है, लेकिन इस बात की प्रेरणा देने वाले भी मार्क्‍सवादी ही हैं।

नैनो का सिंगूर से साणंद तक का सफर एक अर्थ में कार्ल मार्क्‍स के सामने महात्मा गांधी की विजय है। वर्ग-संघर्ष में विश्वास रखने वाले पश्चिम बंगाल के मार्क्‍स के अनुयायियों ने पिछले कुछ दशकों में जिस प्रकार से हिंसक किसान-मजदूर आंदोलन चलाया है उसने राज्य में एक असहिष्णु राजनीतिक माहौल का सृजन किया है।

इसके विपरीत महात्मा गांधी ने गुजरात में मजदूर महाजन जैसी संस्था का सृजन कर, जिस प्रकार से एक सहिष्णु समाज की विरासत को कायम किया उसके प्रभाव में गुजरात में आज भी व्यापक औद्योगिक शांति देखने को मिल रही है। इसके विरुद्ध उद्योगपतियों और मालिकों को परेशान करते रहने की मार्क्‍सवादियों की विरासत को ममता ने हथिया लिया है। इसके बाद रतन टाटा का मार्क्‍स की जमीन छोड़कर गांधी के गुजरात की राह पकड़ना स्वाभाविक ही है।
<-लेखक गुजरात में राजनीतिक समीक्षक हैं।





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