संपादकीय. टाटा मोटर्स ने पश्चिम बंगाल के सिंगूर में जमीन-विवाद को तूल पकड़ता देखकर इस परियोजना के लिए कई राज्य सरकारों से बातचीत के बाद अंतत: बहुचर्चित नैनो कार के उत्पादन के लिए गुजरात सरकार के साथ समझौता कर लिया।
टाटा को अहमदाबाद से दूर साणंद में ग्यारह सौ एकड़ जमीन दी गई है, जिसे टाटा बाजार दर पर खरीदेगा। अहमदाबाद में एक संवाददाता सम्मेलन में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने टाटा और गुजरात के बीच नैनो परियोजना को लेकर हुए समझौते को एक नया अध्याय करार दिया और राजनीतिक निशानेबाजी का भी प्रदर्शन किया। गौरतलब है कि नैनो परियोजना को लेकर गुजरात सरकार से समझौता होने से पहले टाटा मोटर्स की बातचीत कई राज्य सरकारों से चल रही थी, जिनमें कर्नाटक का नाम सबसे आगे था, क्योंकि टाटा मोटर्स के प्रबंध निदेशक और कर्नाटक के मुख्यमंत्री की मुलाकात के बाद कई तरह की अटकलबाजियां शुरू हो गई थीं।
इस वक्त लोगों को यही दिख रहा है कि नैनो परियोजना के लिए जमीन के मुद्दे पर सिंगूर में ममता बनर्जी के नेतृत्व में जो आंदोलन चला उसकी वजह से टाटा मोटर्स ने अन्यत्र जाने का फैसला किया। क्या यही सच है? सिंगूर में टाटा मोटर्स हजार एकड़ जमीन से कम पर मानने को तैयार नहीं था, जबकि ममता बनर्जी तीन सौ एकड़ से ज्यादा जमीन लौटाने के लिए आंदोलन कर रही थीं।
इसलिए नैनो के लिए जब गुजरात में आसानी से और कई तरह की बुनियादी सुविधाओं के साथ जमीन मिल गई, तो वह क्यों सिंगूर में परेशान रहते? अगर थोड़ी देर के लिए यह मान भी लें कि जमीन एक बड़ा मुद्दा था, तो टाटा के पास पहले से ही उड़ीसा के गोपालपुर में साढ़े तीन हजार एकड़ जमीन है। वहां से पारादीप बंदरगाह, भुवनेश्वर का एयरपोर्ट सब कुछ नजदीक है और उन्हें इस जमीन के लिए मुआवजा भी देने की जरूरत नहीं थी।
उड़ीसा के मुख्यमंत्री ने एक पत्र लिखकर टाटा को इस बात की याद भी दिलाई थी कि आपके पास तो पहले से ही इतनी अधिगृहीत जमीन है। मगर इस पर कोई चर्चा क्यों नहीं हुई? दूसरी बात यह कि उड़ीसा से बिल्कुल नजदीक जमशेदपुर में टाटा का पुराना कार्यालय है, झारखंड और उड़ीसा में सस्ता श्रम भी उपलब्ध है और जमीन तो वहां पहले से उनके पास थी ही।
इसके साथ ही उड़ीसा चूंकि सिंगूर से ज्यादा नजदीक है इसलिए वहां स्थापित संयंत्रों को उड़ीसा ले जाना ज्यादा आसान था। ‘बाजार दर’ पर गुजरात में जमीन खरीदकर नैनो परियोजना लगाने वाले टाटा के लिए साणंद में सब कुछ ‘सानंद’ रहेगा या नहीं, यह तो खैर वक्त तय करेगा, लेकिन फिलहाल पश्चिम बंगाल का नुकसान गुजरात के बड़े फायदे के रूप में सामने आया है।