bhaskar Web English
HomeVichaar Vichaar

अमेरिका और पूंजीवादी व्यवस्था

दृष्टिकोण. economic बहुत से लोग अमेरिकी वित्तीय संकट की तुलना 1993 के ‘ग्रेट डिप्रेशन’ से कर रहे हैं। जब पूरा विश्व मंदी की चपेट में आ गया था। कुछ अन्य लोग इसे चक्रीय रुझान बता रहे हैं, जो समय के साथ समाप्त हो जाएगा।

लोगों को अभी यह अहसास नहीं कि मौजूदा तूफान के दूरगामी परिणाम होंगे व यह भविष्य में पैदा होने वाली स्थितियों का एक संकेत मात्र है। आर्थिक संकट पैदा होना कोई नई बात नहीं है। द्वितीय विश्वयुद्ध से अब तक कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जिनमें उन अर्थव्यवस्थाओं को ढहते देखा गया है, जो बेहद मजबूत समझी जाती थीं।

इनमें कुछ तो लंबे इंतजार के बाद विकास की मुख्यधारा में वापसी करने में सफल रहीं, जबकि कुछ तो कभी भी मंदी से बाहर नहीं आ सकीं। इसमें दक्षिण पूर्व एशिया का वित्तीय संकट जेहन में अब तक ताजा है। गिरावट से पहले देश ‘एशियाई बाघ’ के रूप में पहचाने जाते थे, जो वक्त पड़ने पर जापान जैसे उन्नत देश को भी चुनौती देने में सक्षम थे। यहीं नहीं इनको भारत व चीन सहित एशिया की दूसरी अर्थव्यवस्थाओं के विकास की धुरी करार दिया जाता था। इनमें इंडोनेशिया, मलयेशिया, थाईलैंड व दक्षिण कोरिया प्रमुख रूप से शामिल थे।

एशियाई बाघों के रूप में प्रचलित देश अमेरिका समर्थित वित्तीय संस्थाओं द्वारा दिए गए प्रलोभनों का शिकार हो गए। कई विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) विकास का जरूरत से ज्यादा आकलन कर बैठे। इस प्रक्रिया में वे अमेरिका को निर्यात बढ़ाते गए। इस चक्कर में इनकाकापरेरेट जगत (मुख्यत: मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियां) अल्पावधि की पूंजी दीर्घकालीन योजनाओं के लिए कर्ज के तौर पर लेने की गलती कर बैठा। इसके बाद पूरा विश्व उस स्थिति का गवाह बना, जिसे विदेशी मुद्रा संकट कहा जाता है। इनके केंद्रीय बैंक अमेरिका की नकल करते-करते इस बात पर गौर करना भूल गए कि स्थितियां उनके हाथ से बाहर होती जा रही हैं। इसका असर इतना गहरा था कि दक्षिण-पूर्व के देशों को संभलने में एक दशक से भी ज्यादा समय लगा।

विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में एक होने के बावजूद जापान मंदी की गिरफ्त से अभी तक बाहर नहीं आ सका है। यहां भी रियल एस्टेट की गिरावट ने ही कहर बरपाया था। कमोबेश ऐसी ही स्थितियों से मैक्सिको व अर्जेंटीना भी प्रभावित हुए।

सकारात्मक विकास दर ही किसी कंपनी के परिणाम तय करने का पर्याप्त मानदंड नहीं है। हालांकि, वर्तमान मार्गदर्शी सिद्धांतों के मद्देनजर देखा गया है कि अमेरिकी कंपनियां अपनी विकास दर कायम रखने के प्रयास में हर तरह के हथकंडे अपनाती रही हैं। बिक्री बढ़ाने के लिए ये हर तरह के ग्राहकों को सेवाएं प्रदान करती गईं। इनमें वे ग्राहक भी शामिल थे, जो कर्ज लौटाने में सक्षम न थे। लंबे समय तक यह खेल चलता रहा।

निवेश बैंक भ्रम का जाल फैलाए रहे और यहां के बैंक व वित्तीय संस्थान लंबी-लंबी राशियों के कर्ज बांटते गए। काफी समय तक सब कुछ ठीक-ठाक चला। एक से लिए हुए कर्ज का इस्तेमाल दूसरे का कर्जा निपटाने के लिए किया जाता रहा। हालांकि, यहीं से वर्तमान वित्तीय संकट की पृष्ठभूमि तैयार होना शुरू हुई जिसने धीरे-धीरे पूरे अमेरिका को अपनी चपेट में ले लिया। सबप्राइम के तहत वितरित ऋणों से उत्पन्न करीब एक लाख करोड़ डालर का घाटा ऐसे तमाम मुद्दों में से एक है, जो इस पूरे घटनाक्रम का छोटा-सा हिस्सा है। छोटा इसलिए क्योंकि अमेरिका के चालू खाते के घाटे पर गौर करें तो स्थितियां और भयावह नजर आती हैं।

जो लोग यह मानते हैं कि अमेरिकी संकट जल्द खत्म हो जाएगा, उन्हें शायद इस बात का अंदाजा नहीं है कि इस प्रकार की मंदी से उबरने में कुछ वर्ष तो लगते ही हैं। वह भी तब जब सुधरने की जरा सी गुंजाइश बची हो। यहां गौर करने योग्य बात है कि दुनिया की वे अर्थव्यवस्थाएं जिन्होंने अमेरिकी सिद्धांत नहीं माने, वे कभी भी इस तरह की मंदी में नहीं फंसीं और न ही वर्तमान में किसी प्रकार के संकट का सामना कर रही हैं।

पश्चिम में लंबे समय तक चीन की निंदा की जाती रही है। मैं दुनियाभर के कई सेमिनारों में मौजूद रहा हूं, जहां बुद्धिजीवी बयान करते देखे गए हैं कि चीन की अर्थव्यवस्था का दम कैसे निकलेगा। चीन को हमेशा रूढ़िवादी वित्तीय नीतियों के लिए व उसके केंद्रीय बैंक की सख्ती के लिए कोसा जाता रहा है। इसी तरह वहां के सरकारी बैंकों के एनपीए (नॉन परफार्मिंग एसेट्स) भी हमेशा निंदापूर्ण चिंतन का केंद्र रहे हैं।

जब पूरा अमेरिका वित्तीय संकट से त्रस्त है, चीन अपने डूबत कजरें के बावजूद तेजी से विकास की डगर पर अग्रसर है। केवल चीन ही नहीं तमाम लैटिन अमेरिकी देशों की अर्थव्यवस्था भी वर्तमान स्थितियों में ठीक स्थिति में हैं। भारत के लोकतांत्रिक ढांचे व उसकी नियोजित नीतियों का ही परिणाम हैं कि हम आर्थिक सुधारों के नाम पर जरूरत से ज्यादा उदार नहीं हुए। सतर्कतापूर्ण रवैये ने हमें इस दौर में सुरक्षित रखा हुआ है।

ऐसे में यह कहें तो गलत न होगा कि अमेरिकी कारोबारी सिद्धांतों के चलते ही दुनिया के सबसे बड़े वित्तीय संकट का जन्म हुआ है। इसमें वे सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं, जो अमेरिकी नीतियों पर अंधा विश्वास करते रहे। यह बीस वर्ष पहले हुआ होता तो परिणाम कुछ और ही होते। आज के माहौल में विश्व के एकीकृत स्वरूप को देखते हुए सबको अमेरिकी नीतियों का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

मेरा मानना है कि अर्थव्यवस्था के विकास के लिए समाजवाद पर जोर दिया जाना चाहिए। हालांकि, यह भी सत्य है कि सामाजिक आर्थिक तंत्र के तहत पूंजीवाद ही लोगों को सर्वाधिक प्रभावित करता है। इसलिए दुनिया का आगे का रास्ता भी पूंजीवाद से ही होकर जाता है। यही वह स्थिति है जब इस तंत्र को सुस्त पूंजीपतियों से बचाने की जरूरत महसूस होती है। यह समझने की जरूरत है कि समाज की समृद्धि उसकी सूचीबद्ध कंपनियां या उसके २क् फीसदी शीर्ष लोगों की दौलत से नहीं आंकी जा सकती। इसका असली मतलब समाज की निचली 80 फीसदी जनसंख्या की समृद्धि से है। जब लोगों की खरीदारी क्षमता मजबूत होगी तभी समाज तरक्की करेगा।
-लेखक सुप्रसिद्ध ‘मैनेजमेंट गुरु’ हैं।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: