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अमिताभ बच्चन : अभिनव यात्रा

परदे के पीछे.मित्र अतिथि श्री सुमित्रानंदन पंत ने जन्में बालक का नाम रखा अमिताभ और पिता हरिवंशराय बच्चन ने इस अवसर पर कविता लिखी ‘फुल्ल कमल, गोद नवल, गेह में विनोद नवल, बाल नवल, दूध नवल, पूत नवल, वंश में विभूति नवल, नवल दृश्य, नवल दृष्टि, जीवन का नव भविष्य, जीवन की नवल सृष्टि।’ उम्र के इस पड़ाव पर अमिताभ बच्चन ने पिता की आकांक्षा के अनुरूप सफलता अर्जित की परंतु वे ‘नवल सृष्टि’ में असफल रहे, जो शायद किसी और के लिए भी संभव नहीं है।

उनके इस जन्मदिन पर (ग्यारह अक्टूबर) ‘द्रोण’ की असफलता का थोड़ा असर अवश्य ही होगा और सफल विदेश दौरे की खुशी भी थोड़ी सी धूमिल होगी। अपने जीवन के अग्निपथ पर अमिताभ ने दोस्तों से ज्यादा दुश्मन बनाए हैं, कुछ लोगों के दिल भी तोड़े हैं परंतु उनके तमाम विरोधी भी एकमत से स्वीकार करते हैं कि वे विलक्षण अभिनेता हैं।

आप तीस सैकंेड की विज्ञापन फिल्म में भी उनकी कला देख सकते हैं। अभिनय शायद उन्हें अपनी मां तेजी से विरासत में मिला है परंतु कड़ा परिश्रम करना, मन को मार कर भी काम करना और अनुशासन उन्हें अपने पिता से मिला है।

जिन्होंने कवि की कद-काठी लिए महू (इंदौर) में सैनिक शिक्षा पूरी की थी, क्योंकि उन्हें तेजी के रिश्तेदारों को बताना था कि एक हाथ में कलम तो दूसरे हाथ में बंदूक वे थाम सकते हैं। महू में लिए इसी कठोर प्रशिक्षण के समय उन्हें अमिताभ के न रुकने वाले बुखार की जानकारी मिलने पर बाबर की तरह अच्छी सेहत के लिए कामना करते हुए शराब छोड़ने की शपथ ली और उसे ताउम्र निभाया भी। इस तरह मधुशाला के रचियता ने शराब से तौबा की।

माता-पिता से लेते हुए भी बहुत कुछ अमिताभ का अपना भी है। इतनी सारी गंभीर बीमारियों के बावजूद उन्होंने काम हमेशा किया है और विपरीत परिस्थितियों में जुझारुपन कायम रखा है। यह कम ही लोग जानते हैं कि वे अनिद्रा के भी रोगी हैं। रातों में खुद को दिए की तरह जलाकर अंतहीन रातें काटना आसान नहीं होता।

अमिताभ के पिता को उनके जन्म की एक रात पहले सपना आया था जिसमें उन्होंने देखा कि उनके पिता अपने पूजा कक्ष में रामचरित मानस की पोथी खोले मास पारायण के पांचवें विश्राम का पाठ कर रहे हैं। प्रसंग है मनु की तपस्या करने का और विष्णु भगवान के प्रगट होकर वरदान मांगने का कि तुम्हारे समान पूत पाऊं। ठीक इसी क्षण उनका स्वप्न टूटा क्योंकि तेजी को प्रसव पीड़ा प्रारंभ हो गई थी।

हरिवंश जी ने ‘समान पूत पाऊं’ के अपने विश्वास को अमिताभ के मन में भी जमा दिया और इस अति विशिष्ट होने के भाव ने ही उनसे सामाजिक व्यवहार में कुछ गलतियां भी कराईं। दूसरों को कमतर समझने के कारण ही कुछ लोग उनके शत्रु बन गए! उन्होंने कभी अहंकार प्रदर्शित नहीं किया परंतु स्वयं को ‘चोजन वन’ होने के भाव को कई लोगों ने स्पष्ट पढ़ लिया।

बहरहाल एक पिता के रूप में उनके लिए यह स्वाभाविक है कि वे अपने पुत्र अभिषेक को भी अति विशिष्ट मानें और उससे भी कमाल करने की आकांक्षा रखें। अभिषेक समझदार हैं परंतु उनके अभिनय की सीमाएं हैं जिसके परे जाना उनके लिए संभव नहीं है। जैसा कि हम ‘द्रोण’ में देख चुके हैं परंतु वह करण जौहर की ‘दोस्ताना’ में जंचेगा।

अमिताभ के लिए अपने पुत्र की सीमाओं को स्वीकार करना कठिन हो रहा है। क्या स्वयं अमिताभ अपने पिता की तरह एक ईमानदार आत्म-कथा लिख सकते हैं? यह उनके बस की बात नहीं परंतु किसी दिन अभिषेक सच्ची आत्म-कथा लिख पाएगा-यह संभव है। पिता पुत्र का रिश्ता तीर-कमान की तरह होता है और तनाव होने पर ही बेटे का तीर जिंदगी में निशाने पर लगता है।





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Arjun
Friday, 10th Oct 2008, 22:34
we people are fade up with these stories. Please it an request to the writers to give importance to all the deserving people in the industry and not just go around few ones who are very expert in diplomacy. There are many talented people who deserve attention.