Manoranjan
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अपनी ख़ास शिना़ख्त वाली अभिनेत्री नंदिता दास हालिया रिलीÊा ‘रामचंद पाकिस्तानी’ के साथ एक बार फिर से चर्चा में आ गई हैं। पाकिस्तानी निर्माता-निर्देशक मेहरीन जब्बार की ‘रामचंद पाकिस्तानी’ में नंदिता ने पाकिस्तान के सिंध की रहने वाली एक हिंदू दलित महिला चंपा का चरित्र निभाया है, जिसका बेटा और पति ग़लती से बार्डर क्रॉस कर जाते हैं। काफ़ी समय से फ़िल्मी पर्दे से ग़ायब रही नंदिता से हिसाब-किताब मांगे, तो वह जवाब देती हैं कि बतौर निर्देशक उन्होंने एक फ़िल्म ‘फ़िराक़’ डायरैक्ट कर ली है। मतलब यह कि दर्शकों से उनका फ़िराक़ (जुदाई) बेवजह नहीं था।
‘फ़िराक़’ के बारे में बताइए?
गुजरात में 2002 में हुए दंगों के बाद की एक स्थिति पर मेरी यह फ़िल्म आधारित है। दंगों के लगभग एक महीने बाद के एक दिन, यानी चौबीस घंटों की कहानी फ़िल्म में पिरोई गई है। इसमें आम लोगों की यात्रा है, जिसके तहत कुछ पीड़ित हैं, कुछ कर्ता-धर्ता हैं और कुछ ख़ामोश तमाशाई हैं। यह एक सामूहिक प्रभाव वाली फ़िल्म है, जिसमें कई कथाक्रम चलते हैं, जो कभी आपस में गुंथ जाते हैं, तो कभी अलग हो जाते हैं। अंतत: एक ही स्थान पर घटित होने के कारण यह भावनात्मक जुड़ाव और सरोकार की फ़िल्म है।
क्या आपने ‘फ़िराक़’ में अभिनय किया है?
नहीं, बतौर डायरैक्टर ही मुझ पर काफ़ी Êिाम्मेदारियां आ गई थीं।
बतौर निर्देशक यह आपकी पहली फ़िल्म है। जब आपने फ़िल्म कंपलीट करने के बाद पर्दे पर देखी, तो वही प्रभाव आपको मिला, जो आपने अपनी कल्पनाओं में सोचा था?
देखिए, हर आदमी को कई अलग-अलग तरह की स्थितियों के बीच काम करना पड़ता है। तो मैं यह नहीं कह सकती कि मुझे पूरा का पूरा वही मिला है, जो मैंने सोचा था। मुझे अपने अनुभवों के आधार पर भी यही लगता है कि कोई भी फ़िल्म या सीन परफैक्ट नहीं होता है, वरना उसके बाद सीखने या करने की और गुंजाइश बचेगी ही नहीं। हां, मैंने जो महसूस करते हुए फ़िल्म को प्रस्तुत किया है, उसने देखने वालों के दिलों को छुआ है। वही मेरी कामयाबी है।
यह फ़िल्म कई फ़िल्मोत्सवों में तो दिखाई जा चुकी है। भारत में कब रिलीÊा होगी?
‘फ़िराक़’ की निर्माता परसेप्ट पिक्चर कंपनी ने इस फ़िल्म को अगले साल जनवरी में रिलीÊा करने की योजना बनाई है। पर हां, यह फ़िल्मोत्सवों में एक अंतराल के बाद देश-विदेश में दिखाई जा रही है।
निर्देशन की तकनीकी जानकारियां आपने किस तरह हासिल कीं?
मैं काफ़ी वर्षो से एक्ंिटग कर रही हूं। मैंने निर्देशकों को सीन की शूटिंग करते हुए देखा-सुना है। हालांकि तब मैं ऐसा नहीं सोचती थी कि किसी दिन डायरैक्ट करूंगी, तो मुझे उन्हें उसी तरह से देखना-समझना चाहिए। एक तरह से यह अवचेतन में बस रहा था। देश-विदेश की कई अच्छी फ़िल्में मैंने देखी हैं, उनकी कहानी कहने के ट्रीटमैंट को इनडायरैक्टली देखा-समझा है, तो बस, इसी तरह जानकारियां ली हैं।
आपके पिताजी जतिन दास मशहूर पेंटर हैं, तो क्या उनके कैनवास के फ्रेम से भी आपको फ़िल्म के फ्रेम बनाने में मदद मिली?
यह सही बात है कि मैं बचपन से पिताजी को पेटिंग करते हुए देख रही हूं, पर वह अलग चीÊा है और फ़िल्म के फ्रेम अलग हैं। आप गाना नहीं गा सकते हैं, पर अच्छे गाने को सुनकर उसकी प्रशंसा तो कर सकते हैं न।
आपने अभिनय कम कर दिया है?
मैं पहले भी बहुत कम काम करती थी। जब मनपसंद काम मिला, तभी किया। मैं महत्वाकांक्षी कभी नहीं रही। अभी भी जो फ़िल्म या प्रोजैक्ट मेरे दिल को छूते हैं, उन्हीं से जुड़ती हूं।
एक समय आप, शबाना आÊामी, दीप्ति नवल वग़ैरह अभिनेत्रियां वही ख़ास तरह की फ़िल्में करती थीं, जो मेनस्ट्रीम की अभिनेत्रियां नहीं करती थीं? आज मेनस्ट्रीम की अभिनेत्रियां वही फ़िल्में करने लगी हैं, तो क्या यह भी एक वजह है आपके कम काम करने की?
हां, आज ऐसा हो रहा है। मेनस्ट्रीम की अभिनेत्रियां वैसी फ़िल्में कर रही हैं, जिससे एक समय वह दूर भागा करती थीं। शोहरत और पैसे के साथ हर अच्छी एक्ट्रैस के अंदर यह तलब तो रहती ही है कि बतौर एक्ट्रैस उसकी विश्वसनीयता और इÊÊात बढ़े। उन्हें एक्टिंग के मामले में गंभीरता से लिया जाए, एक पीरियड के बाद लगभग सभी मेनस्ट्रीम की अभिनेत्रियां ऐसा सोचने लगती हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है। जहां तक मेरी बात है, तो मैं उतना काम कर लेती हूं, जितना मुझे करना है।
वह कौन से और काम हैं, जिनमें आपको संतुष्टि मिलती है?
देश-विदेश के कई ऑर्गनाइजेशन और कॉलेज हैं, जिनके लिए मैं वर्कशॉप करती हूं। चूंकि वह वर्कशॉप मुद्दों पर आधारित होती है, तो मुझे उनसे जुड़कर एक मानसिक संतुष्टि मिलती है।
आप इतनी सामाजिक और पारिवारिक हैं, तो अब अपनी शादी को लेकर क्या सोचती हैं?
शादी को मैं अंतिम Êारूरत नहीं मानती हूं। मैंने शादी की भी और नहीं भी की, ऐसा ही आप समझ सकते हैं। हम दोनों आज अलग हो गए हैं, पर अभी भी फ्रैंड की तरह हैं।