जब मैं छोटी थी, मैं ही क्या, मेरा पूरा परिवार अमिताभ बच्चन का फ़ैन था। ख़ासकर मेरा छोटा भाई तो उनका ऐसा दीवाना था कि वह किसी और हीरो की फ़िल्म देखता ही नहीं था। मैंने अमित जी का नाम ‘ढिशुम ढिशुम’ रख छोड़ा था।
एक बार का वाकया बताती हूं। हम पूरा परिवार ऋषि कपूर-टीना मुनीम स्टारर ‘कर्Êा’ देखने गए। मेरा भाई जाने को तैयार नहीं था, क्योंकि उसमें अमिताभ बच्चन जो नहीं थे। आख़िर मैंने उसे यह कहकर फुसलाया कि उसमें अमिताभ बच्चन दिखेंगे। फ़िल्म शुरू होने पर पर्दे पर अमिताभ बच्चन को न देखकर मेरा भाई सो गया। तब हमने उसे यह कहकर उठाया कि देख, पर्दे पर ‘ढिशुम ढिशुम’ आया है। यह सबूत है इस बात का कि सिर्फ़ युवाओं और बड़ों में ही नहीं, बच्चों में भी अमित जी कितने लोकप्रिय रहे हैं।
रोचक बात यह भी है कि हमारी पहली मुलाक़ात से पहले वह मुझे जानते थे। हुआ यूं कि मेरी फ़िल्म ‘सोल्जर’ रिलीज हुई थी। एक दिन मुझे एक ऐसा लैटर मिला, जिसे पाकर मुझे अपनी आंखों पर विश्वास करना मुश्किल था। यह लैटर अमिताभ बच्चन के लैटर हैड पर था और उन्होंने अपने हाथ से मुझे लिखा था। इसमें उन्होंने ‘सोल्जर’ में मेरे काम को पसंद किया था। मैंने वह लैटर फ्रेम कराकर अपने घर में रखा हुआ है। नए लोगों को इस तरह और कौन प्रोत्साहित करेगा!
इसके बाद हमारी मुलाक़ात एक पार्टी में हुई। जीती-जागती इस किंवदंती को साक्षात अपने सामने देखकर मेरे रोमांच का ठिकाना न था। लेकिन अपने सरल व्यवहार से उन्होंने मुझे एक मिनट में सहज बना दिया। फिर हमने ‘लक्ष्य’, ‘वीर Êारा’, ‘दि लास्ट लियर’ जैसी फ़िल्में साथ में कीं। हर जगह वह अपने व्यवहार और कार्यो से यह सिद्ध करते हैं कि उन्हें मिलेनियम स्टार का ख़िताब यूं ही नहीं मिला, बल्कि वही उसके हक़दार हैं। इस उम्र में भी वह 25-30 साल के लड़कों की तरह एनर्जी से भरपूर हैं।
उनके साथ कई फ़िल्म कर चुकने के बाद भी मैं उनकी वैसी ही फ़ैन हूं, जैसी बचपन में थी। टूर के दौरान स्टेज पर उनकी परफार्मेस देखकर मैं बहुत रोमांचित होती थी। जब दर्शक उनसे डायलॉग बोलने की मांग करते थे और वह अपनी हृदयस्पर्शी आवाज में ‘दीवार’ के डायलॉग बोलते थे- ‘आज ख़ुश तो बहुत होगे कि मैं तुम्हारे दर पर आया हूं..’, मेरी आंखें नम हो जाती थीं। वह एक्टर नहीं, जादूगर हैं।