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छियासठ वर्ष का जीवन और हजार सालों की यातनाएं

harikrishanहम सबका और हिंदी साहित्य का सौभाग्य हो सकता था कि हरिकृष्ण प्रेमीजी आज अगर हमारे बीच होते, तो सौ वर्ष की उम्र पार कर रहे होते। पर वे तमाम लोग जो प्रेमीजी को नजदीक या दूर से भी जानते थे, उन्हंे पता था कि प्रेमीजी लोगों के बीच रहते हुए भी अपनी मर्जी से अनुपस्थित हो जाने की क्षमता रखते थे और आज जबकि उनको शरीर का त्याग किए हुए तीन दशक से अधिक का समय हो गया है, हमारे बीच ठीक वैसे ही उपस्थित हैं जैसे कि अपनी बाल सुलभ छवि रमाए हुए वे हरदम दिखाई देते थे।

एक सफेद उजली धोती, उस पर मलमल का कुर्ता, करीने से काढ़े हुए चमकीले सफेद बाल, गोरा चेहरा और अंगुलियों के बीच दबी हुई सिगरेट। प्रेमीजी को करीब से जानने और उनके चेहरे के भीतर छुपे एक अद्भुत साहित्यकार को पढ़ने के अवसर लगातार प्राप्त होने के पीछे मेरे पास अपने कारण थे।

पहला तो यह कि मैं प्रेमीजी के समधी और कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट के कार्यकारी मंत्री श्यामलालजी के साथ कार्य करता था और दूसरे यह कि बीस-बाइस वर्ष की उम्र में नए-नए कविता-कहानियां लिखने वालों को एक मार्गदर्शक और प्रशंसक के रूप में जिस प्रतिभा-पुरुष की तलाश रहती है उसकी पूर्ति प्रेमीजी की सहृदय विनम्रता से हो जाती थी।

यह उस जमाने की बात है जब इंदौर शहर के एक कोने में नई-नई बसी प्रकाश नगर कॉलोनी की पहचान प्रेमीजी की वहां मौजूदगी से होती थी। पर सही बात तो यह भी है कि प्रकाश नगर के मकान में रहते हुए भी प्रेमीजी को शायद हर वक्त किसी नए ठिकाने की तलाश रहती थी, जहां वे अपनी मर्जी का सुकून प्राप्त कर सकें।

प्रेमीजी ने अपने जीवन के अंतिम पच्चीस वर्ष इंदौर में बिताए थे। इसे मध्यप्रदेश का दुर्भाग्य समझा जाना चाहिए कि हरिकृष्ण प्रेमी नाम की शख्सियत द्वारा प्रदेश की कथित सांस्कृतिक राजधानी में बिताई गई कोई चौथाई शताब्दी के दौरान उन पच्चीस वर्षो की उनकी उस पूर्व यात्रा का अपेक्षित सम्मान और आकलन नहीं किया गया जिसमें भारत की आजादी के संघर्ष के लिए सपरिवार भोगी गई पीड़ाओं और आंसुओं के अध्याय छिपे पड़े हैं। कैसे पता चल पाएगा कि अंग्रेजों की हिरासत में दो बार यातनाएं सहने वाले प्रेमीजी को गांधीजी में पूरा यकीन था कि बापू देश को दो हिस्सों में नहीं बंटने देंगे। इसीलिए ही उन्होंने लाहौर से अपने घर व पिंट्रिंग प्रेस का सामान और बहुमूल्य पांडुलिपियां मुंबई लाने की कभी चेष्टा नहीं की।

इन पांडुलिपियों में प्रेमचंदजी और ताराशंकर बंदोपाध्याय के उपन्यास और स्वयं की रचनाएं थीं। पर विभाजन हो ही गया। अपने प्रकाश नगर स्थित आवास और विनोबा भावे द्वारा स्थापित विसर्जन आश्रम के बीच दूरी को प्रेमीजी अपनी धीमी चाल से भी कुल सात-आठ मिनट में नाप सकते थे, पर खोजना पड़ेगा कि जिस व्यक्ति ने गांधीजी के आह्वान पर नमक कानून को तोड़ते हुए 1930 में गिरफ्तारी दी थी उसने वहां लगे फाटक को कभी लांघा कि नहीं?

हरिकृष्ण प्रेमी का अपना संसार था और वे उसमें ही सांस लेते हुए अपने नाटकों और कविताओं के पात्रों के साथ मौन संवाद में खोए रहते थे। उन्होंने इंदौर शहर को कभी परिचय नहीं दिया कि मध्य भारत प्रांत के पहले मुख्यमंत्री गोपीकृष्ण विजयवर्गीय उनके बड़े भाई थे या कि बीस वर्ष की आयु में जिन हरिभाऊ उपाध्याय के साथ उन्होंने सहायक के रूप में जीवन की साहित्यिक यात्रा शुरू की थी, वे उस समय राजस्थान में अजमेर राज्य के मुख्यमंत्री थे।

‘एक भारतीय आत्मा’ के नाम से पहचान रखने वाले माखनलाल चतुर्वेदी, वियोगी हरि, राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन, जगन्नाथ प्रसाद मिलिंद, पंडित उदयशंकर भट्ट, चंद्रगुप्त विद्यालंकार, उपेंद्रनाथ अश्क, क्षेमचंद सुमन, रामनाथ सुमन, मोहन राकेश ये वे कुछ नाम हैं जिनके साथ प्रेमीजी ने इंदौर में घर बनाने से पहले के पच्चीस वर्षो में अपने संघर्ष और रचनाधर्मिता के दिन गुजारे और इस दौरान कोई बत्तीस नाटक, बारह काव्य पुस्तकें, कई रेडियो रूपक और संस्मरणात्मक आलेख देश को दिए।

प्रेमीजी एक निजी व्यक्ति थे। वे दूसरों की प्राइवेसी का भी उतना ही सम्मान रखते थे जितनी कि स्वयं के लिए। जिसे कि बिना किसी से मांग किए हुए वे स्वयं ही प्राप्त कर लेते थे। प्रेमीजीके संसार के किसी बाहरी पात्र को जितना संकोच उनसे मिलने के पूर्व रहता था उतना ही उनसे मिलने के बाद भी। ऐसा इसलिए कि वे किसी को भी प्रभावित करने का सोच भी नहीं रखते थे, उसके लिए प्रयास करना तो बहुत दूर की बात थी। शायद इसीलिए मध्यप्रदेश में अपनी उपस्थिति के बारे में उन्होंने इंदौर में कोई मुनादी नहीं होने दी।

प्रेमीजी की पुत्री श्रीमती उषा चौकसे ने अपने पिता के बारे में लिखा है : ‘उनकी जीवनयात्रा दिल के सहारे चली थी। उन्होंने अनेक अभाव और वेदना सहते हुए दिल से लिखा और दिल से जिए। आखिर दिल कब तक सहता? छियासठ वर्ष के जीवन में उन्होंने हजार वर्षो की यातना सही होगी। रूढ़ियों और बेड़ियों से लड़ने वाले का यही भाग्य होता है। इस युद्ध में कभी किसी को विजय नहीं मिलती। क्योंकि अज्ञान और अंधविश्वास द्वारा गढ़ी गई ये जंजीरें बहुत सख्त होती हैं।’ प्रेमीजी के बारे में इससे ज्यादा और कुछ कहा नहीं जा सकता।





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