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कृषि क्षेत्र में कॉपरेरेट जगत

दृष्टिकोण. corporate इस बात में कोई दो राय नहीं कि एक नीति के रूप में कृषि क्षेत्र में उत्पादन और व्यापार बढ़ाने के लिए व्यापारिक घरानों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, लेकिन ऐसा दोनों वर्गो के लिए फायदेमंद माहौल बनाकर ही किया जा सकता है। कृषि क्षेत्र में व्यापारिक घरानों के प्रवेश को परंपरागत कृषि व्यवस्था के विकल्प के रूप में देखना सही नहीं है।

भारत में कृषि को मुख्यत: छोटे किसानों का धंधा माना जाता है, जो देश के कुल किसानों का ८३ फीसदी है। खुदरा व्यापार में भी कृषि उत्पादों की बिक्री का दारोमदार छोटे दुकानदारों और फेरी लगाकर सामान बेचने वालों पर है। कोई भी प्रयास जो छोटे किसानों और छोटे व्यापारियों के हित में नहीं है, के वांछित परिणाम हासिल नहीं हो सकते। कृषि क्षेत्र में आने वाले बड़े व्यापारिक घरानों को इस वर्ग के साथ पूरा तालमेल कायम कर आगे बढ़ना चाहिए।

जहां तक पैदावार का सवाल है तो बड़े कॉपरेरेट घराने ही समस्या का समाधान नहीं हैं। बड़े व्यापारिक घराने कृषि क्षेत्र में अपवाद हो सकते हैं, लेकिन वह देश की वर्तमान व्यवस्था का विकल्प नहीं हो सकते। खेतों में आज भी छोटे किसानों की मेहनत फलदायक है, लेकिन इन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जैसे कृषि तकनीक में सुधार के लिए धन की कमी, बाजार में महंगे दाम पर बिकने वाली फसल के बीजों का अभाव, कमजोर बुनियादी ढांचा आदि।

इन हालात में कृषि क्षेत्र में व्यापारिक घरानों का प्रवेश तभी लाभदायक हो सकता है, जब कॉपरेरेट घराने खुद को सीधे तौर पर उत्पादन की प्रक्रिया से न जोड़ें। व्यापारिक घरानों को किसानों द्वारा बाजार में महंगे दाम पर बिकने वाली फसलों की खरीद पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। इस काम के लिए व्यापारिक घराने उन्नत तकनीक के साथ खेती करने, जिन फसलों की मांग ज्यादा होती है उनके बढ़िया बीज किसानों को मुहैया करवाने, कीटनाशकों का संयमित इस्तेमाल यकीनी बनाने और अन्य चीजों के वाजिब इस्तेमाल की जानकारी देकर खेती को प्रबंधन से जोड़ सकते हैं। ऐसा करने पर पैदावार तो बढ़ेगी ही, उपभोक्ताओं को वाजिब दाम पर मनचाही चीज भी मिलेगी।

छोटे किसानों को वाजिब भुगतान कर व्यापारिक घराने फसल के भंडारण, ग्रेडिंग और पैकेजिंग करने के बाद देश-विदेश के बाजार में मार्केटिंग कर सकते हैं। कृषि क्षेत्र में कॉपरेरेट की भागीदारी फायदे का सौदा बनाने के लिए जरूरी है कि कॉपरेरेट देश के मौजूदा कृषि ढांचे को बरकरार रखते हुए नई तकनीक और मार्केटिंग का लाभ किसानों तक पहुंचाए। ऐसा होने पर ही व्यापारिक घरानों और देश के छोटे-बड़े किसानों के बीच आपसी विश्वास का रिश्ता कायम हो पाएगा। मौजूदा दौर में कृषि के विकास के लिए व्यापारिक घरानों और छोटे किसानों के बीच सीधा और पारदर्शी माहौल बनाना बहुत जरूरी है। जब तक छोटे किसानों को व्यापारिक घरानों की कृषि क्षेत्र में भागीदारी से फायदा नहीं होगा तब तक देश में खेती के लिए खुशगवार माहौल की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

अविश्वास के माहौल में किसानों और व्यापारिक घरानों के बीच होने वाले कानूनी करार भी गैर-प्रभावी रहेंगे, क्योंकि न तो कॉपरेरेट इस स्थिति में होते हैं कि बड़ी संख्या वाले किसानों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकें और न ही किसानों के लिए ऐसा कर पाना आसान होता है। टमाटरों के प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) के लिए पंजाब में आई पैप्सी कंपनी की विफलता हमारे सामने एक बड़ा उदाहरण है। उन्नत तकनीक की मदद से टमाटरों की पैदावार बढ़ाने में कंपनी कामयाब रही, लेकिन जब पैदावार हासिल करने की बारी आई तो मामला बिगड़ गया। दाम जब ऊंचे थे तब किसानों ने टमाटर बाजार में बेच दिए और जब रेट जमीन छूने लगे, तब कंपनी पर खरीद का दबाव डालने लगे। इस समस्या का हल निकालने में कंपनी विफल रही और अंतत: प्लांट बेच दिया गया।

विफलता का दूसरा उदाहरण ‘मोहिंदरा शुभलाभ’ का है जिसने पंजाब एग्रो से मिलकर मक्के की पैदावार में प्रवेश किया था। इस कंपनी ने किसानों को बीज तो बेच दिए, अतिरिक्त खर्च भी वसूल लिया पर कभी भी किसानों के पास जाकर उनकी समस्याएं जानने की कोशिश नहीं की। परिणाम यह हुआ कि योजना बुरी तरह पिट गई। कंपनी की योजना में किसानों की भागीदारी न होने के कारण उनके हाथ में भी कुछ नहीं था। ऐसे कई उदाहरण हैं जिनमें योजनाएं विफल रहीं और किसानों के बीच अविश्वास का माहौल बन गया।

व्यापारिक घरानों के साथ किसानों के समझौतों की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि कंपनियां किसानों से कुछ हासिल करने से पहले उनकी मदद करें और बाद में उन्हें मुनाफे में भागीदार बनाएं। इस काम की शुरुआत किसानों को बिना किसी शुल्क के बढ़िया बीज और अन्य जरूरी सामान मुहैया करवाकर की जा सकती है। बीजों और अन्य जरूरी सामान का भुगतान किसान बाद में कंपनियों को अपनी पैदावार बेचने के मौके पर कर सकते हैं।

इस प्रक्रिया में किसानों को लगने लगता है कि कंपनी के प्रति समर्पित रहने में उनका कोई नुकसान नहीं है। ऐसे करार उन फसलों की पैदावार में ज्यादा कारगर होते हैं, जिनकी घरेलू बाजार में ज्यादा मांग नहीं होती। ऐसी कई सब्जियां, फूल और औषधीय पौधे हैं जिनकी घरेलू मार्केट में मांग नहीं होती, लेकिन विदेशों में महंगे दाम पर बिकते हैं। ऐसी फसलों की पैदावार की सफलता भी इसी बात पर निर्भर करती है कि उससे किसानों को कितना लाभ मिलेगा।

बात जब किसान द्वारा कड़ी मेहनत कर तैयार की गई फसल को बेचने की होती है तो रिटेल मार्केट में उसके हाथ निराशा ही लगती है। हालांकि अब स्थिति में बदलाव आने लगा है और घरेलू जरूरतों का सामान बड़े शोरूमों में बिकने लगा है, लेकिन इससे उपभोक्ताओं को कोई खास फायदा नहीं मिल रहा। कारण यह है कि यहां बिकने वाली चीजें भी उतनी ही ताजा होती हैं जितनी फुटकर विक्रेताओं से मिल जाती हैं।

निम्न तथा मध्यवर्ग अभी भी फुटकर विक्रेताओं से ही सामान खरीदने को तरजीह देता है, क्योंकि बड़े शोरूम और मॉल्स में कर्मचारियों का रवैया आत्मीय न होकर पूरी तरह पेशेवर होता है। हाल के वर्र्षो में प्रतिस्पर्धा बढ़ी है, लेकिन रिटेल और कॉपरेरेट अभी भी एक-दूसरे के लिए खतरा नहीं हैं।

दोनों ही अपनी मनमर्जी नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसा करने पर ग्राहकों के दूसरी तरफ आने की संभावना बनी रहती है। कुल मिलाकर कृषि क्षेत्र में व्यापारिक घरानों का आगमन सही है लेकिन जब तक इसे परंपरागत खेती के विकल्प के रूप में नहीं लिया जाएगा तब तककृ षि अर्थव्यवस्था विकसित नहीं हो सकती।
-लेखक जाने-माने कृषि वैज्ञानिक हैं।





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