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प्रधानमंत्री का कश्मीर दौरा

संपादकीय. कुछ दिनों से कश्मीर लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा के केंद्र में है और दुयरेग से यह चर्चा वहां लगातार खराब हो रहे हालात को लेकर हो रही है।

भारत सरकार से स्वायत्तता की मांग को लेकर जब कश्मीरी अलगाववादी गुटों ने एक बड़ी रैली करने की घोषणा की, तो सुरक्षा कारणों से घाटी प्रशासन को विवश होकर वहां अनिश्चितकालीन कफ्यरू लगाना पड़ा। पिछले कई वर्षो से हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता कश्मीर को भारत से अलग और स्वायत्त राज्य घोषित करने की मांग को लेकर आंदोलन चलाते रहे हैं।

गौरतलब है कि अमरनाथ भूमि आवंटन विवाद के दौरान जम्मू और कश्मीर के बीच शुरू हुआ विरोध घाटी में स्वायत्तता के सवाल से जुड़ गया है। ऐसे हालात में प्रधानमंत्री की दो दिवसीय कश्मीर यात्रा को लेकर कूटनीतिक हलकों में बहुत सारे सवाल और जिज्ञासाएं पैदा हो रही हैं, क्योंकि पिछले कुछ महीनों से वहां आजादी की मांग को लेकर कई बड़ी रैलियां हो चुकी हैं और राजनीतिक स्तर पर भी वहां बहुत उथल-पुथल मची हुई है।

प्रधानमंत्री दो परियोजनाओं के उद्घाटन के सिलसिले में कश्मीर जा रहे हैं। एक तो घाटी के लिए रेल है और दूसरी पनबिजली परियोजना, मगर इसे घाटी के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण से देखने के बजाय अलगाववादी गुट के नेता अलग दृष्टिकोण से देख रहे हैं।

इस वजह से प्रधानमंत्री जब तक वहां रहेंगे, तब तक अलगाववादियों ने जन-कफ्यरू का आह्वान किया है। प्रधानमंत्री जिन परियोजनाओं के उद्घाटन के सिलसिले में वहां जा रहे हैं, उससे होने वाले नफा-नुकसान पर बात करने की जगह घाटी के अलगाववादी नेता वही रटा-रटाया जुमला फिर उछाल रहे हैं कि भारत सरकार के पैकेजों और परियोजनाओं से कश्मीर की समस्याओं को नहीं सुलझाया जा सकता है।

450 मेगावाट की इस बिजली परियोजना से राज्य को इस वजह से भी बहुत लाभ होने की संभावना है, क्योंकि राज्य में बिजली की बेहद जरूरत है और वहां मांग और आपूर्ति के बीच छह सौ मेगावाट का अंतर है। दूसरी ओर कश्मीर के उत्तरी हिस्से में बारामूला से लेकर दक्षिण में स्थित कांजीगुंड को जोड़ने वाली रेल सेवा वहां जनता के लिए असंभव स्वप्न के साकार होने जैसा है। क्योंकि इस असंभव रेल लाइन को बनाने के लिए चिनाब नदी पर 369 मीटर ऊंचा पुल बनाया गया है यानी फ्रांस के एफिल टावर से भी ऊंचा, जो कि 324 मीटर ऊंचा है।

वक्त का तकाजा यह है कि आजादी और स्वायत्तता के मसले को छोड़कर, इस वक्त इन परियोजनाओं से जुड़े अधिकारियों और इंजीनियरों के जज्बे और श्रम को सलाम किया जाए, जिन्होंने असंभव कार्य को संभव किया है और जनता के जीवन को पहले से अधिक सुगम बनाने की कोशिश की है।





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