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कहानियां यथार्थ का आईना

ग्वालियर. साहित्यकार गोविन्द मिश्र ने शैलेष मटियानी की पुस्तक ‘गोकुली गपूरन’ की साहित्यिक समीक्षा की, जिसमें उन्होंने कहा कि यदि कोई लेखक अपनी कृति को पाठकों को दोबारा पढ़ने के लिए विवश न कर पाए तो उसका लेखन व्यर्थ है।

पुस्तक की विवेचना करते हुए उन्होंने कहा कि लेखक ने भारतीय समाज की समरसता को बनाए रखने का सफलतम प्रयास किया है। इसी तारतम्य में साहित्यकार मंजूर अहतेशाम ने सलमान रश्दी के उपन्यास ‘मिडनाइड चिल्ड्रन’ की स्वतंत्र भारत के यथार्थ के संदर्भ में मीमांसा की।

साहित्यकार प्रेमपाल शर्मा ने विषय की परंपरागत लकीर को तोड़ते हुए और व्यापकता देते हुए वर्गीज कुरियन की पुस्तक ‘सपना जो सच हुआ’ की समीक्षा की। उन्होंने कहा कि दुग्ध क्रांति के प्रणोता वर्गीज कुरियन की पुस्तक भले ही उपन्यास नहीं है, लेकिन स्वयं वर्गीज का चरित्र और कार्य सभी के लिए प्रेरणादायी रहा। दुग्ध क्रांति, गुजरात से शुरू होकर सारे देश में फैल गई। उसी का फल है कि आज हमारा देश दुग्ध उत्पादन में विश्व में अव्वल है।

साहित्यकार पंकज विष्ट ने श्रीलाल शुक्ल द्वारा लिखित पुस्तक ‘रागदरबारी’ पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि यथार्थ वह है जो बृहतर समाज के हितों और लोगों के भविष्य के बारे में बात करता है। जो पुस्तकें समाज के हितों से जुड़ी होती हैं, उन्हें प्रत्येक व्यक्ति पढ़ना चाहता है। सत्र के आखिर में साहित्यकार कमला प्रसाद ने मुक्तिबोध की पुस्तक ‘विपात्र’ पर विचार व्यक्त किए।

कार्यक्रम के अंत में सत्यप्रकाश मिश्र, त्रिलोक चंद, विजय तेंदुलकर, प्रभा खेतान सहित कई दिवंगत साहित्यकारों एवं आतंकवाद का शिकार हो चुके निदरेष लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

पोस्टर्स और छायाचित्रों से किया साहित्यकारों को नमन
देश के ख्यातिलब्ध कथाकारों के मौलिक छायाचित्र एवं उनके विचारों को पोस्टर्स के माध्यम से संगमन-14 में प्रदर्शित किया गया है। छायाचित्र का प्रदर्शन कमलकिशोर कमल ने एवं पोस्टर्स का प्रदर्शन पंकज दीक्षित ने किया। इस अवसर पर संगमन संयोजक प्रियंवद, स्थानीय संयोजक महेश कटारे, पवन करण, जहीर कुरैशी, कमलेश भट्ट, बैजू कानूनगो, जगदीश सलिल, ओमप्रकाश शर्मा, कौशलेन्द्र घुरैया, वीरेन्द्र सिंह, डा. अन्नपूर्णा भदौरिया, डा. सीमा शर्मा, डा. पद्मा शर्मा, डा. उर्मिला सिंह तोमर आदि उपस्थित थे। संचालन ओमा शर्मा ने किया।





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