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अब शाहरुख लेखक बन गए!

परदे के पीछे.शाहरुख खान अपनी अगली अनाम फिल्म की पटकथा खुद ही लिख रहे हैं। सफल आदमी हर काम को करना चाहता है और उसे बहुत अधिक आत्मविश्वास भी होता है। यह फिल्म एक सुपर नायक की फिल्म होगी जैसे राकेश रोशन की ‘कृष’ थी। इस फिल्म को बनाने के पीछे शाहरुख के पास तीन कारण हैं।

पहला कारण तो यह है कि दक्षिण के प्रसिद्ध फिल्मकार शंकर ने उनको ‘रोबोट’ की कहानी सुनाई थी और उन्होंने शंकर को अनुबंधित किया था यह फिल्म बनाने के लिए। बाद में फिल्म नहीं बन पाई। इसका कारण यह है कि ‘रोबोट’ में पचास फीसदी दृश्य विशेष प्रभाव वाले थे और शाहरुख चाहते थे कि ये दृश्य उनकी अपनी संस्था बनाए, जिसके लिए उन्होंने अमेरिका से आधुनिकतम मशीनों का आयात किया था। उनकी इस चाहत के विपरीत शंकर ये दृश्य मद्रास में शूट करना चाहते थे, इस वजह से फिल्म रुक गई।

शाहरुख खान ने विशेष प्रभाव के दृश्य पैदा करने वाले अपने स्टूडियो पर बहुत अधिक धन लगाया है और उन्हें स्वयं ही अपनी फिल्म बनाकर यह साबित करना होगा कि उनके स्टूडियो में अमेरिका की टक्कर का काम होता है। अब शंकर के हट जाने के बाद उनके लिए जरूरी था कि सुपर नायक की छवि वाली फिल्म वह खुद बनाएं।

दूसरा कारण यह है कि उनका बेटा आर्यन ‘कृष’ देखने के बाद रितिक रोशन का जबरदस्त फैन हो गया है और अपने बेटे की प्रशंसा के लिए शाहरुख ने ‘ओम शांति ओम’ में सिक्स पैक एब्स वाली बॉडी बनाई, आईपीएल क्रिकेट में भी घुसे। अत: आर्यन की भी जिद है कि वह सुपर नायक बन कर प्रस्तुत हों। तीसरा कारण यह है कि हॉलीवुड की सुपरमैन या बैटमैन फिल्मों ने भारत में बच्चों का एक नया दर्शक वर्ग बना दिया है, जो इस तरह की फिल्में देखना चाहता है।

सिनेमा में बहुत लंबे समय तक ऐसी फिल्में बनती रहीं जिनमें आम आदमी विपरीत परिस्थितियों में किसी प्रेरणा से इतना शक्तिशाली हो जाता है कि वह अपने सभी शत्रुओं को हराता है। हॉलीवुड के प्रभाव में सुपर नायक फिल्में प्रारंभ हुईं, क्योंकि अमेरिका के पास अपनी मायथेलॉजी नहीं है और सुपर नायक की किंवदंती सामाजिक संरचना में आवश्यक होती है।

सुपर नायक के पास दैवीय शक्तियां होती हैं और इस मायने में वह हमारी अवतारवाद की धारणा के नजदीक आता है। मुद्दा यह है कि क्या इस तरह के कपोल कल्पित पात्र बच्चों के लिए शिक्षाप्रद हैं या बच्चों के लिए वह फिल्में शिक्षाप्रद हैं जिसमें आम आदमी की विजय होती है! सिनेमा माध्यम में दीए और तूफान की लड़ाई हमेशा लोकप्रिय रही है और शायद सिनेमा का जन्म भी इसीलिए हुआ है कि वह आम आदमी को नायक की तरह प्रस्तुत करे। आम आदमी के नायक होने वाली फिल्मों में मानवीय करुणा और प्रेम होता है, जो सुपर नायक वाली फिल्मों में संभव नहीं है।

इसलिए चार्ली चैप्लिन से लेकर राजकुमार हिरानी तक के फिल्मकार आम आदमी की यशोगाथा गाते रहे हैं। सुपर नायक वाली फिल्में आपको फंतासी की दुनिया में ले जाती हैं और आप उम्मीद करने लगते हैं कि ऐसा कोई नायक हमारी जिंदगी की जंग लड़ेगा। इसलिए आम आदमी को नायक दिखाने वाली फिल्में मनुष्य के लिए बेहतर होती हैं।

पूंजीवादी अमेरिका ने आर्थिक संपन्नता के दौर में अपने आम आदमी को भव्यता के मोह में जाने दिया है। आम अमेरिकी छोटी कार पसंद नहीं करता, छोटा पिज्जा नहीं खाता, छोटा चिकन नहीं खाता और छोटी दुकान से माल भी नहीं खरीदता। पूरा अमेरिका भव्यता के मोहपाश में जकड़ा हुआ है। उन्हें किफायत का अर्थ ही नहीं मालूम, उनकी मौजूदा आर्थिक विपत्ति में थोड़ा बहुत हाथ इस भव्यता के मोहपाश का भी है। यह सुपर नायक फिल्में भव्यता के इसी मोहपाश को सिनेमा के परदे पर प्रस्तुत करती हैं।





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