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विश्व में चोटी पर बैठे फाइनेंशियल दिग्गज रेत के ढेर की तरह ढह रहे हैं। इन सब के बीच एक आदमी जो अभी भी अपना स्थान बनाए बैठा है वह है वारेन बफे। उन्होंने हाल ही में गोल्डमैन सैक में 22,500 करोड़ रुपए लगाए हैं। जहां बाजार में चारों तरफ शेयर बेचने में होड़ लगी हुई है वहीं वारेन बफे ज्यादा से ज्यादा खरीदारी में जुटे हुए हैं। उनके द्वारा की जा रही खरीदारी अन्य निवेशकों के लिए संदेश देती है, ‘जब दूसरे खरीदारी से डरें उस समय लालची बनें व जब दूसरे लालची बनें उस समय खरीदारी से डरें।’ अपनी इसी सोच को वारेन ने हमेशा बना कर रखा है।
अब जब मैं बाजार की तरफ नजर दौड़ाता हूं तो मुझे हर तरफ एक डर ही नजर आता है। परंतु मेरे ख्याल में इस डर में भी निवेश करने का एक अच्छा अवसर है। ऐसा अवसर जीवन में फिर कभी नहीं मिलेगा जब बाजार इतने निचले स्तरों पर आ जाएगा। पहले सभी लोग यही सोचते थे कि मंदी केवल यूएसए में ही है लेकिन अब यूरोप भी इससे अछूता नहीं है।
आयरलैंड, ग्रीक और जर्मनी ने बैंक डिपॉजिट के लिए गारंटी देनी शुरू कर दी है। आयरलैंड व डेनमार्क भी अपने बैंकों को बचाने के लिए यत्न कर रहे हैं वहीं साउथ कोरिया ने घोषणा कर दी है कि वह अपने फॉरेक्स रिजर्व बैंकों को उधार देगा। ऐसा करने में कुछ भी गलत नहीं है क्योंकि आर्थिक संकट एक महामारी की तरह फैल रहा है।
आइए अब हमारे देश के बाजार का हाल देखते हैं। सोमवार को जहां स्टॉक एक्सचेंज 724 अंक गिर गया वहीं मंगलवार को इसने 367 अंक गिर कर अपने 2 से ज्यादा सालों के रिकॉर्ड तोड़ दिए। ऐसा क्यों हो रहा है? वास्तव में इसका सबसे पहला कारण ग्लोबल फाइनेंशियल इंस्ट्ीच्यूट का फेल होना है। इन इंस्ट्ीच्यूट के सहयोगियों द्वारा ही एफआईआई के माध्यम से भारत में पैसा लगाया जा रहा था।
अब जब जड़ में ही कीड़ा लग जाए तो पेड़ को तो फल लग ही नहीं सकते यानी कि जब पेरेंट इंस्ट्ीच्यूट ही गिरने लगे हैं तो उसकी शाखाओं पर प्रभाव तो पड़ेगा ही। इसीलिए चारों तरफ हो रही ताबड़तोड़ बिकवाली से भारत ही नहीं ब्राजील, रशिया व चीन जैसे देश भी अछूते नहीं हैं। वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसे इंस्ट्ीच्यूट हैं जिन पर इस मंदी का कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा है। लेकिन यदि चारों तरफ नजर दौड़ाई जाए तो इन्होंने भी अपने निवेश के मुंह बंद कर रखे हैं। विकसित देशों की तुलना में भारत जैसे देशों में निवेश को ज्यादा रिस्की माना जा रहा है। इसका कारण है कि जब मन में डर समा जाता है तो दिमाग की सोचने समझने की शक्ति खत्म हो जाती है।
शेयर बाजार पर नजर दौड़ाई जाए तो 2007 तक एफआईआई ने भारत में लगभग 52 बिलियन डॉलर का निवेश किया था। वहीं जनवरी 2008 से लेकर अब तक इसका 20 प्रतिशत हिस्सा (लगभग 9.5 बिलियन) एफआईआई ने निकाल लिया है। इसकी तुलना में घरेलू म्यूचुअल फंडों ने केवल 2.5 बिलियन डॉलर ही निवेश किए हैं। यही वह डिमांड सप्लाई का अंतर है जो बाजार को नीचे की तरफ धकेल रहा है। अब जब बाजार में इतना बड़ा संकट चल रहा है तो इस बात की कोई भविष्यवाणी नहीं करेगा कि बाजार नई उंचाईयों पर कब तक जाएगा।
लेकिन एक बात सही है कि यह सिर्फ एक डर है जिसने हमारे बाजार को प्रभावित किया है। यह डर कहीं दूर फैली उस भयंकर बिमारी का है जिससे डर कर हमने खुद को आईसीयू में भर्ती कर लिया है। विश्व भर के बाजारों में जिन सिक्योरिटी से संकट फैला है भारत में ऐसी सिक्योरिटी नहीं हैं। घरेलू बैंकों के कामकाज को देखें तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने बैंकों के कामकाज पर पूरी नजर रखी हुई है। पश्चिमी देशों की तुलना में भारत की सेविंग दर में भी 35 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई है।
दूसरी तरफ कमोडिटी की कीमतों में भी गिरावट आनी शुरू हो गई है। कच्च तेल भी लगभग 90 डॉलर प्रति बैरल ही रह गया है। इसका साफ अर्थ है कि महंगाई अब बड़ा संकट नहीं रहेगा। सेबी व रिजर्व बैंक भी अर्थव्यवस्था को संकट से निकालने के लिए कुछ भी करेंगे। सीआरआर में कटौती कर दी गई है, पार्टिसिपेटरी नोट्स से बंदिश हटा दी गई है, ईसीबी के नियम आसान कर दिए गए हैं ताकि बाहर से ज्यादा उधार लिया जा सके।
हाल ही में इन उपायों ने चाहे कुछ खास लाभ ना दिया हो लेकिन कुछ समय बाद इनका असर जरूर दिखाई देगा। जब इनका असर दिखना शुरू होगा जो डरने वालों की अपेक्षा में लालची अपनी जीत पर ठहाका लगाएंगे।