दृष्टिकोण. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा शनिवार को कश्मीर घाटी में नौगाम स्टेशन पर घाटी में पहली रेल को हरी झंडी दिखाकर रेल सेवा की शुरुआत करने के दौरान किए गए सुरक्षा इंतजाम और एक खास वर्ग द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शन को देखकर लगता है इसके लिए आगे चुनौतियां कम नहीं होंगी।
टीवी रिपोट्र्स बताती हैं कि इसे लेकर कई स्थानीय नागरिकों के मन में खुशी और विस्मय का भाव है। एक स्थानीय निवासी को यह कहते हुए दिखाया गया कि उसने कभी नहीं सोचा था कि वह जीवन में कभी जम्मू-कश्मीर में ट्रेन में सफर कर सकेगा, लेकिन वह गलत साबित हो गया। देखा जाए तो इस रेल सेवा की कल्पना पहली बार 1997 में की गई थी, जब इंद्र कुमार गुजराल देश के प्रधानमंत्री थे और आज 11 साल बाद यह सपना साकार हुआ।
राजवंशर कस्बे को दक्षिण में अनंतनाग से जोड़ने वाली 72 किलोमीटर लंबी इस रेल सेवा परियोजना की समग्र लागत 11000 करोड़ रुपए आंकी गई है और इस फेज के निर्माण में तकरीबन 2200 करोड़ का निवेश हुआ है। इस दुर्गम भूभाग में और वह भी लगातार आतंकवादियों के खतरे के बावजूद पटरी बिछाने में भारतीय रेलवे ने जो दृढ़ता दिखाई है, इसके लिए उसकी पीठ थपथपानी होगी। ऐसी उम्मीद है कि यह रेल सेवा जल्द ही आगे बढ़ेगी और देश के बाकी रेलवे नेटवर्क के साथ जम्मू-कश्मीर को जोड़ देगी।
प्रधानमंत्री की मौजूदा श्रीनगर यात्रा के संदर्भ में आपसी तौर पर एक-दूसरे से जुड़े तीन सूत्रों पर गौर करने की जरूरत है। पहला है राज्य में सुरक्षा-व्यवस्था की मौजूदा स्थिति और राजनीतिक माहौल जो अमरनाथ यात्रा भूमि हस्तांतरण के मसले पर तेजी से विभाजित हो गया।
भारतीय राष्ट्र के खिलाफ गुस्सा और अलगाव का भाव जिस तरह जम्मू-कश्मीर के कुछ वर्र्गो में नजर आ रहा है, वह हकीकत है और घाटी में सैन्य व अर्धसैनिक बलों समेत सुरक्षा बलों की भारी तादाद में मौजूदगी इस भयावह सच्चाई को पेश करती है कि यथास्थिति को बरकरार रखने के लिए देश को कितने प्रयास करने होंगे। प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान बारामूला इलाके में दो लोगों का मारा जाना इस बात का गवाह है कि नई दिल्ली की किसी पहल का यहां किस कदर विरोध होता है। हालांकि इस सारभूत तथ्य कि न ‘आजादी’ और न पाकिस्तान के साथ मिलना दिल्ली और श्रीनगर की खिलाफत करने वाले समूहों के लिए संभावित विकल्प है, यह मध्य क्षेत्र ही है जिसे नवीनीकृत ढंग से उभारा जा सकता है।
यह हमें दूसरे आपस में जुड़े हुए सूत्र तक लाता है- यानी जम्मू-कश्मीर के मामलों में पाकिस्तानी कारक। एक दशक से भी पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने लाल किले की प्राचीर से यह कहा था कि विभाजन का एकमात्र अधूरा एजेंडा पाक अधिकृत कश्मीर को उसी स्तर तक लाना है, जैसा यह 1947 से पहले था- यानी पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर को उसकी सम्मिलित भौगोलिक पहचान वापस दिलाना।
उनके इस वक्तव्य से इस्लामाबाद चिंतित हो उठा और उसे लगा कि भारत पाक अधिकृत कश्मीर को फिर से हथियाने का रास्ता तलाश रहा है। अब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नियंत्रण रेखा को संपर्क रेखा बनाने के अपने प्रस्ताव में लिए जरूरी राजनीतिक-आर्थिक प्रेरक तत्व जोड़े हैं और इसके लिए सड़कों और बस सेवाओं को खोला जा रहा है, जिसके लिए दोनों ओर जरूरी सुरक्षा व्यवस्था की दरकार है। जम्मू-कश्मीर में चुनाव होने हैं और व्यापक लोकतांत्रिक प्रयोग के हिसाब से उनकी सफलता बहुत महत्वपूर्ण होगी, लेकिन यह बंदूक या अनवरत राजनीतिक मनमुटाव के साए में नहीं कराए जा सकते। यहीं पाकिस्तान की भूमिका और इसकी भारत-विरोधी स्थिति प्रासंगिक हो जाती है।
दशकों से पाकिस्तान और इसकी सेना जम्मू-कश्मीर में भारत के खिलाफ धार्मिक अतिवाद और छोटे-मोटे विवाद भड़काने की नीति पर चलती आ रही है और यही नाजुक द्विपक्षीय संबंधों के मध्य विवाद का विषय है। हालांकि पाकिस्तान के मौजूदा राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने कश्मीर और भारत को लेकर कई सुधारवादी वक्तव्य दिए हैं। उन्होंने अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान स्पष्ट तौर पर स्थानीय आतताई समूहों को ‘आतंकवादी’ बताने के साथ-साथ भारत के साथ संबंध सुधारने और व्यापारिक व आर्थिक संबंध सामान्य करने पर भी बल दिया। जरदारी की तरह कई पाकिस्तानियों की भी राय है।
इस तरह प्रधानमंत्री का यह कहना कि सम्मिलित जम्मू-कश्मीर के भीतर (यानी श्रीनगर और मुजफ्फराबाद के बीच) और भारत व पाकिस्तान के मध्य व्यापार व आर्थिक विकास को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, बेहद अक्लमंदी की बात है। लेकिन क्या पाकिस्तानी सेना और आईएसआई लंबे समय से चली आ रही अपनी भारत-विरोधी विचारधारा को बदलेंगे? मौजूदा वैश्विक आर्थिक संकट और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं तथा दक्षिण एशिया के आम लोगों की जिंदगी पर इसके दीर्घकालीन प्रभाव को देखते हुए ‘कश्मीर’ मसले पर और भी निष्पक्ष ढंग से तुरंत गौर करने की जरूरत है।
भारत में राष्ट्रीय महत्व के केंद्रीय मसलों जैसे कि इक्कीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में कैसे संप्रभुता और व्यापक सुरक्षा व्यवस्था कायम रह सकती है, इस पर निष्पक्ष ढंग से बहस की जरूरत मनमोहन सिंह की यात्रा का तीसरा आपस में जुड़ा सूत्र है। जब डॉ. सिंह सुझाव देते हैं कि नियंत्रण रेखा, संपर्क रेखा बन सकती है और इसे बनना चाहिए, तो इसका मतलब है कि राष्ट्रीय सीमाएं व सरहदें राष्ट्रीय हो जाती हैं- जैसा कि यूरोप के कुछ हिस्सों में है। जहां यह बात सच है कि दक्षिण एशिया ऐसे किसी राजनीतिक कायाकल्प से कोसों दूर है, प्रादेशिक और राष्ट्रीय संप्रभुता की स्थिति की फिर से जांचना अपरिहार्य है। भारतीय और पाकिस्तानी संदर्भ में कश्मीर घरेलू राजनीतिक भाषणों में बेहद भावुक और अति विवादित मसला बन गया है। लेकिन यह एक ऐसा क्षेत्र है, जिस पर भारत में विशुद्ध यर्थाथवादी और सृजनात्मक बहस की जरूरत है चूंकि इसमें भारत के चीन के साथ संबंध भी निहित हैं।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कश्मीर घाटी में जिस रेल सेवा को हरी झंडी दिखाई है वह महज 72 किमी लंबी है, लेकिन यह आपसी जुड़ाव और सहभागिता दोनों का प्रतीक है, जो आतंक के साए में दबे इस क्षेत्र में दीर्घकालीन सामाजिक व आर्थिक समृद्धि की वाहक बन सकती है। हां, निश्चित ही स्थानीय लोगों की असल राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और उनकी संवेदनाओं का सम्मान होना चाहिए, लेकिन इस प्रतीकात्मक रेल को पहले रफ्तार पकड़ने दीजिए- ऐसा न हो कि देश के भीतर व बाहर मौजूद बैरी ताकतें इसे पटरी से उतार दें।
-लेखक सामरिक मामलों के विश्लेषक हैं।