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सिस्टर अल्फोंजा को संतत्व

संपादकीय. केरल की दिवंगत नन सिस्टर अल्फोंजा को वेटिकन में पोप द्वारा संत की उपाधि दिए जाने के बाद भारतीय ईसाई समुदाय में बेहद उत्साह है। सिस्टर अल्फोंजा को संत घोषित किए जाने के साथ ही भारतीय ईसाई समुदाय को कई उपलब्धियां एक साथ हासिल हुई हैं।

इस सम्मान के बाद सिस्टर अल्फोंजा भारत की पहली महिला ईसाई संत बन चुकी हैं। दूसरी बात यह है कि इससे पहले मदर टेरेसा को संतत्व प्रदान करने की चर्चा चलती रही है, मगर वेटिकन ने मदर टेरेसा को 2003 में सिर्फ ‘धन्य’ घोषित किया था, जिसे धार्मिक शब्दावली में बेटिफिकेशन कहा जाता है, लेकिन उन्हें संत की उपाधि घोषित करने की प्रक्रिया अभी चल ही रही है। इससे पहले 17वीं सदी में एक भारतीय सेंट गोंसालो गार्सिया को संत की उपाधि मिली थी, लेकिन उनकी माता पुर्तगाली थीं।

इस नजरिये से सिस्टर अल्फोंजा कैथोलिक चर्च से संत घोषित की जाने वाली पहली भारतीय संत हैं। गौरतलब है कि वेटिकन में पिछले हफ्ते के अंत में हुई एक बैठक में सिस्टर अल्फोंजा को संत घोषित करने का फैसला हुआ था। इस बैठक में पोप और दूसरे कार्डिनल उपस्थित थे। सिस्टर अल्फोंजा को गरीबों और सभी धर्मो के स्थानीय लोगों के साथ काम करने के लिए यह उपाधि दी गई है।

सिस्टर अल्फोंजा को लंबी आयु नहीं मिली, लेकिन कम उम्र में ही उन्होंने बेहद लोकप्रियता अर्जित कर ली थी और केरल में उनके चमत्कार के बारे में कई तरह की कहानियां प्रचलित हैं। मगर यह बात ध्यान देने योग्य है कि मदर टेरेसा ने जिस तरह कुष्ठ रोगियों की सेवा की, पूरा जीवन मानवता के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया, उन्हें संत घोषित करने की प्रक्रिया में क्या बाधा है? वेटिकन ने यह घोषणा ऐसे समय में की है, जब इसके राजनीतिक निहितार्थ से बचना संभव नहीं है। क्योंकि वेटिकन की घोषणा के बाद इटली के कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने टिप्पणी की है कि सिस्टर अल्फोंजा को संत घोषित करने से भारत के उन ईसाइयों को संबल मिलेगा, जिनके खिलाफ कुछ राजनीतिक कारणों से भारत में हिंसा हुई है और उन्हें सताया जा रहा है।

यह सच है कि कुछ चरमपंथी तत्वों की वजह से उड़ीसा का कंधमाल क्षेत्र अशांत रहा है, लेकिन भारत की अधिसंख्य जनता इस तरह की हिंसात्मक कार्रवाई और जुल्म के सख्त खिलाफ है। इस तरह की घटनाएं भारत की सामासिक संस्कृति के विरुद्ध है। मानवता के लिए किए गए सिस्टर अल्फोंजा के अवदान के कारण ही वेटिकन ने उन्हें संत घोषित किया है, इसलिए इस वक्त किसी तरह की राजनीतिक चर्चा करने का कोई औचित्य नहीं बनता है। बेहतर तो यही होगा कि इस नितांत धार्मिक कृत्य को राजनीति से दूर ही रखा जाए, यही संत जैसे शब्द की गरिमा के अनुकूल है।





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