जयुपर. दो दशक पहले दिल की बीमारी सबसे बड़ी मानी जाती थी। इसके साथ ब्लडप्रेशर या डायबिटीज को मुख्य माना जाता था। आज कैंसर जैसी बीमारी के पीछे भी तनाव एक कारण के रूप में है।
अब होने वाली बीमारियों में सिंड्रोम्स और आधुनिक कार्यस्थल पर होने वाली परेशानियां मुख्य हैं। 15 से 18 घंटे तक भागती जिंदगी में चिकित्सकीय सलाह को अवॉइड करना भी एक बड़ा कारण है। शहर के डॉक्टर्स बता रहे हैं आधुनिक बीमारियां हमारी लाइफस्टाइल से जुड़ी होने के कारण प्रभावित कर रही हैं।
हाइपरटेंशन या हाई ब्लडप्रेशर
दुनियाभर में हर व्यक्ति इस बीमारी से ग्रस्त है। ओबेसिटी से ग्रस्त लोगों में ब्लडप्रेशर की समस्या ज्यादा होती है। मेडिकल वेबसाइट मेडिलाइन प्लस के सर्वे के अनुसार खाने में नमक की ज्यादा मात्रा, गर्भनिरोधक गोलियों का लगातार सेवन, अनियमित खानपान आदि ब्लडप्रेशर के कारण हैं, परन्तु अब तक कोई मुख्य कारण सामने नहीं आया। बावजूद इसके यह हर आयुवर्ग के लोगों में होने लगा है।
डॉ. मुकेश जायसवाल बताते हैं घंटों तक लगातार काम करना और प्रतियोगिता में खुद को कैसे सर्वश्रेष्ठ बताने की दौड़ में हाइपरटेंशन का ग्राफ बढ़ता जा रहा है। डॉ. जायसवाल कहते हैं इन सबसे बचाव के साथ तम्बाकू, अल्कोहल आदि का सेवन न करने से कुछ हद तक सुरक्षा की जा सकती है। 18 घंटे काम करने के बावजूद मनमुताबिक तरक्की न मिलने पर लोग परेशान रहते हैं।
मनोचिकित्सक डॉ. वी.एस. पाल के अनुसार मिडिल एज में ब्लडप्रेशर की समस्या होने पर सबसे पहले डिप्रेशन, एंग्जाइटी आदि होने लगते हैं। इसके कारण नशे की तरफ रुझान होने लगता है और इसी से समस्याएं बढ़ने लगती हैं। बड़ी उम्र के लोगों में स्ट्रैस के कारण डिमेंशिया के लक्षण तक देखे गए हैं। स्ट्रेस का प्रभाव इतना ज्यादा होता है कि कई लोगों में इसके साइड इफेक्ट के रूप में बड़ी बीमारियां तक हो जाती हैं।
डिप्रेशन
डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार 2020 में डिप्रेशन बीमारी व मौत के प्रमुख कारणों में दूसरे नंबर पर होगा। इस बात से कई देशों में इस बीमारी के खिलाफ मुहिम छेड़ी है। ऑस्ट्रेलिया की एक रिपोर्ट के अनुसार 10 फीसदी यूथ इस बीमारी से ग्रस्त हैं। ऐसे में परिवार में डिप्रेशन की हिस्ट्री, सामाजिक परेशानियां और असंतुष्ट परिवार आदि होने से बीमारी अधिक बढ़ती है। इसके कारण ऑर्थराइटिस, इन्फेक्शन, कैंसर आदि होने की आशंका बनी रहती है।
मनोचिकित्सक डॉ. योगेन्द्र देशपांडे के अनुसार माता-पिता की अपेक्षाएं, अत्यधिक प्रतियोगिता, घंटों तक टीवी-कम्प्यूटर-इंटरनेट के सामने बैठे रहने का सीधा प्रभाव बच्चों की लाइफस्टाइल पर पड़ रहा है। इससे न केवल डिप्रेशन, बल्कि हाईपर एक्टिवनेस, बिहेवियरल डिजीज भी होती है। युवाओं में डिप्रेशन के कारण धूम्रपान, ड्रग्स, आत्महत्या, हिंसा आदि की प्रवृत्तियां भी बढ़ती जा रही हैं।
इंसोमनिया
गेस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट डॉ. पर्व एस. लुबाना बताते हैं अकसर लोग अब उस क्षण तक काम कर रहे हैं जब तक कि वे थक कर गिर न जाए। लंबे समय तक ऐसा ही रुटीन रहने से क्षमताएं खत्म होने के कगार पर आ जाती हैं। पूरी नींद न लेने से इंसोमनिया (अनिंद्रा) तीसरी मुख्य बीमारी है। इसका सीधा प्रभाव पाचन तंत्र पर पड़ता है। वहीं अत्यधिक तनाव से गर्दन व स्नायु तंत्र के रोग कम उम्र में ही होने लगते हैं। पौष्टिक आहार लेना, व्यायाम करना और भरपूर नींद लेना आदि इसके सरल से इलाज हैं बशर्ते हम उसका पालन करें। केवल प्रोफेशनल्स ही नहीं बल्कि स्टूडेंट्स भी देर रात तक जाग कर पढ़ाई करते हैं। दिन के समय में नींद पूरी न हो पाने से हमेशा थकान बनी रहती है और इसका सीधा प्रभाव काम करने की क्षमता पर पड़ता है।
हाइपरलिपिडेमिया
खून में अत्यधिक वसा (लिपिड्स) का होना हाइपरलिपिडेमिया है। इसके कारण रक्त वाहिकाओं में थक्के जमकर वे संकरी होने लगती हैं। इससे ब्लडप्रेशर के साथ स्ट्रोक, हार्ट फैल जैसी बीमारियां होना तय है। बड़े अस्पताल के डॉ. सुदर्शन औडिया बताते हैं खानपान की अनियमितताएं व एक जगह बैठकर घंटों काम करना, व्यायाम न करना इसके मुख्य कारण हैं। खाने में कम नमक, कोलेस्ट्रॉल व वसा लेने और नियमित व्यायाम से इससे बचा जा सकता है।
ट्रिगर फिंगर
ऑथरेपेडिशन डॉ. सुनील राजन बताते हैं टेंडनाइटिस यानी अंगुलियों के बीच के जोड़ टेढ़े हो जाना एक आम बीमारी बनती जा रही है। इसका कारण हड्डियों की परेशानी नहीं बल्कि चीजों का असामान्य व लगातार प्रयोग करना है। इसका सीधा जुड़ाव मोबाइल, लैपटॉप, कम्प्यूटर आदि से हैं। इनके प्रयोग में सावधानी रखने के साथ उपयोग में अंतराल रखना जरूरी है।
मूड और लाइफस्टाइल से जुड़ी अन्य बीमारियां
डॉक्टर्स के अनुसार ऐसी बीमारियों का शिकार हो इसके पहले ही हमें कुछ सावधानियां रखनी चाहिए। बस, करना होगा अपने शैड्यूल में थोड़ा सा बदलाव। हर रोज आधा घंटा व्यायाम, ध्रूमपान व अन्य व्यसनों से दूरी, पौष्टिक आहार। कम्प्यूटर पर देर तक बैठे रहने के बजाय ब्रेक लें। मोबाइल से भी थोड़ी दूरी बनाएं। परिवर्तन न करने पर कुछ अन्य बीमारियां भी हैं जो हमें कब, कैसे जकड़ लें पता ही नहीं चलेगा।
वीकेंड सिकनेस
बीबीसी की एक रिसर्च के मुताबिक 3 फीसदी लोग ऐसे हैं जो वीकेंड पर 18 घंटे काम न करके आराम करने की कोशिश करते हैं, तो वे बीमार होने लगते हैं। नीदरलैंड में हुए एक सर्वे के मुताबिक अब काम नहीं आराम के नाम पर बुखार आता है। इसके लिए अपना एक डेली शैड्यूल बनाएं और काम व आराम के घंटे फिक्स करें।
अंडरलोड सिंड्रोम
अत्यधिक काम तो तनाव देता ही है, लेकिन प्रतियोगिता के दौर में कम काम करना भी अंडरलोड सिंड्रोम के रूप में सामने आ रहा है। इसमें थकान, सिरदर्द और हाथ-पैर में दर्द जैसी शिकायत होती है। यूके की एक रिसर्च के मुताबिक जो लोग कई बार कम काम कर पाते हैं उनमें बीमार होने का प्रतिशत बढ़ता जाता है।
फोन नेक
कंधे और गले में दर्द होना। इसका केवल एक कारण कि घंटों मोबाइल गले में टंगा रहता है। यही नहीं, कंधे और गले के बीच मोबाइल दबाकर काम करना या गाड़ी चलाने से मस्कुलर पैन होता है। मोबाइल पर डिपेंड होने के बजाय इससे थोड़ी दूरी भी बनाएं।
माउस रिस्ट
कलाई में लगातार दर्द बने रहना इसका मुख्य कारण घंटों कम्प्यूटर पर बैठना और लगातार माउस का प्रयोग करना। वीडियो गेम्स भी खेलने के कारण हाथों में दर्द बना रहता है। इससे टेटरिस्ट या नाइनटेंडों थम्ब जैसी बीमारियां होती हैं।