मूल्य मंत्र. यदि शब्द बचाए जाएं तो उनसे भी शक्ति मिलती है। जीवन में जब मौन घटता है, तब यह बात और अच्छे से समझ में आती है। मौन शब्दों का शून्य ही नहीं है बल्कि शब्दों की संतुलित अभिव्यक्ति की ताकत भी है। पहले कहा जाता था सोच-समझकर बोलो। अब जमाना आया तोल-मोल कर बोलो, लेकिन मौन जो एक आध्यात्मिक गतिविधि है, उससे एक नई बात होती है। इन दोनों से ऊपर स्थिति है छानकर बोलो।
इसलिए नींद को छोड़कर चौबीस घंटे में कुछ समय के लिए मौन रखना बड़ी ताकत देता है। मौन और चुप्पी के फर्क को समझ लेना जरूरी है। चुप्पी बाहर होती है, मौन भीतर घटता है। चुप्पी, म्यूटनेस में हम दूसरों से बात करना बंद कर देते हैं। मौन, साइलेंस में हम स्वयं से भी वार्तालाप नहीं करते।
जीवन के अनेक अनुत्तरित प्रश्नों का उत्तर मौन में मिल जाता है। संसार से संबंधित सवालों का जवाब संसार में ही मिल जाता है, परंतु जीवन से जु़ड़े प्रश्नों का उत्तर मौन से प्राप्त होता है। हमारे विचारों का प्रवाह नदी की तरह है, इस पर बांधा जाए मौन का बांध। जैसे बांध के कारण उसके रिजरवॉयर में गहराई होती है, उससे सिंचाई होती है और ऊर्जा प्राप्त की जाती है, वैसे ही मौन होने पर विचारों से उच्च परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।
आप जितना मौन में रहेंगे आपके ज्ञान और बुद्धिमत्ता का संतुलन उतना बढ़ता जाएगा। मौन से प्राप्त शक्ति के बाद जब आप मुस्कुराते हैं तो केवल होंठ ही नहीं, पूरा व्यक्तित्व मुस्कुराता है। यदि प्रार्थना कर रहे होते हैं तो वह केवल शब्दों में नहीं हर सांस से प्रार्थना होने लगती है। हम बहुत कुछ करते हैं और फिर भी लगता है करने वाला कोई और है। एक और अच्छी बात यह भी होती है कि हमारे मौन से दूसरों को बोलने का मौका मिलता है जिस कारण हमें अधिक से अधिक जानकारी भी सहजता से उपलब्ध हो जाती है।
-लेखक जीवन प्रबंधन के गुरु हैं।