यह महज संयोग भर नहीं हैं कि जानी-मानी पत्रिका ‘फॉरेन पालिसी’ तथा ‘फंड फॉर पीस’ नामक संगठन ने दुनिया भर के असफल राष्ट्रों की जो सूची जारी की है, उसमें वही देश सबसे ऊपर हैं, जिनके ऊपर हमेशा अमेरिका का आशीर्वादी हाथ उठा रहता था।
जिन सद्दाम हुसैन और उनकी बाथ पार्टी को अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एक समय अमेरिका ने हर तरह से मदद की, उसने जब बढ़े हुए मनोबल की वजह से कुवैत पर चढ़ाई करने की गलती की, तो अमेरिका उसी इराक और सद्दाम हुसैन का सबसे बड़ा दुश्मन बन बैठा। कथित विध्वंसक हथियार रखने (जो पूरी रिपोर्ट ही बाद में गलत निकली) की रिपोर्ट को आधार बनाकर और लोकतंत्र की स्थापना के नाम पर इराक को नेस्तनाबूद कर दिया गया।
रॉबर्ट फिस्क ने अपने लेखों और रिपोर्टो में बताया है कि किस तरह मोसोपोटामिया की सभ्यता के स्मृति चिह्नों को नष्ट किया गया और बगदाद में संग्रहालय को लूटा गया, जिसे सद्दाम हुसैन के खिलाफ जन कार्रवाई के नाम पर जायज ठहराने की शर्मनाक कोशिशें हुईं।
अमेरिका की तमाम कोशिशों और कथित पुनर्निर्माण की योजना के बाद भी आज इराक प्रतिदिन बम विस्फोट, भयंकर गरीबी, भुखमरी और चहुंओर अशांति झेलने के लिए अभिशप्त है। अमेरिकी कार्रवाई के बाद साढ़े छह लाख से ज्यादा लोग अब तक वहां मारे जा चुके हैं और फिलहाल वहां हिंसा थमने के कोई आसार भी नजर नहीं आ रहे हैं।
सूडान के बाद असफल राष्ट्रों की सूची में दूसरे नंबर पर इराक है। 9/11 के तत्काल बाद जार्ज बुश ने हुंकार भरी थी कि मुझे हर हाल में ओसामा बिन लादेन चाहिए-जिंदा या मुर्दा। फिर ओसामा को ढूंढ़ने के नाम पर जिस तरह अफगानिस्तान में सैनिक कार्रवाई की गई और वह आज तक वहां चल ही रही है, इसके बावजूद न तो वहां की राजनीतिक स्थिति बेहतर है, न आर्थिक हालात बेहतर हैं और न ही तालिबानी संगठनों की ताकत में कुछ कमी आई है।
अमेरिकी सेना अफगानिस्तान में आज भी तैनात है और वहां आतंक के नाम पर लड़ाई अभी तक जारी है। नतीजतन अफगानिस्तान की स्थिति आज मध्य युग के किसी देश जैसी हो गई है। पाकिस्तान आतंकवाद से लड़ने के नाम पर जिस तरह अमेरिका के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहा था, वह पाकिस्तान आज खुद आतंकवाद से सबसे ज्यादा पीड़ित है। राजधानी इस्लामाबाद तक में आए दिन जिस तरह बम धमाके हो रहे हैं, उससे पाकिस्तान को अब समझ में आ रहा है कि आतंकवाद से परेशान देशों की वाकई परेशानी किस तरह की होती है?
अल्लाह, आर्मी और अमेरिका का पूरा समर्थन होने का दावा करने वाले सैनिक शासक जनरल परवेज मुशर्रफ कट्टरपंथी धार्मिक नेताओं की आंखों की किरकिरी इन वजहों से भी बने कि उन्होंने आतंकवाद की जड़ को नष्ट करने के लिए काफी प्रयास किया। वह कितना सफल हो पाया और कितना नहीं हो पाया, इस पर बहस सहमति-असहमति व्यक्त की जा सकती है, मगर मुशर्रफ ने प्रगतिशील ताकतों को बढ़ावा देने और कट्टरपंथियों को दबाने की काफी कोशिश की। इसी कड़ी में इस्लामाबाद की लाल मस्जिद की घटना भी है, जिसमें कट्टरपंथियों के खिलाफ कमांडो कार्रवाई करने के बाद से ही उनका बुरा वक्त शुरू हो गया।
आज पाकिस्तान में राष्ट्रपति की कुर्सी पर मुशर्रफ काबिज नहीं हैं और लाल मस्जिद को भी अब सफेद रंग से रंगकर उसकी पहचान से आबद्ध लाल रंग को मिटा दिया गया है। असफल राष्ट्रों की सूची का महत्व भारत के लिए न सिर्फ कूटनीतिक और रणनीतिक कारणों से है, बल्कि यह चिंताजनक भी है, क्योंकि पड़ोसियों की स्थिति में सुधार होने के बावजूद भारत एक-एक करके असफल पड़ोसी राष्ट्रों से घिरता चला जा रहा है। पड़ोस में जब आग लगी हो और अपने देश के अंदर भी राजनीतिक अदूरदर्शिता के कारण भड़कती हुई चिंगारियों को बुझाने और उसके कारणों को मिटाने की जरूरत हो, तब इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना और भी जरूरी हो जाता है।
असफल राष्ट्रों की सूची दरअसल विभिन्न राजनीतिक, आर्थिक, सैन्य और सामाजिक मानदंडों को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। इस सूची का ये अर्थ लगाया जाता है कि इन राष्ट्रों की स्थिति बदतर है और किसी भी दिन असफल हो सकते हैं। इस सूची के अनुसार पहले नंबर पर सूडान है, जहां पिछले दो दशक से गृहयुद्ध जैसी स्थिति है और हजारों लोग वहां अब तक मारे जा चुके हैं।
दूसरे नंबर पर इराक है, जहां नील नदी, खून और लाश नदी के रूप में तब्दील हो चुकी है। यह सूची भारत के लिए गंभीर चिंतन का विषय इस वजह से भी है कि अफगानिस्तान इस सूची में आठवें स्थान पर है और पाकिस्तान बारहवें पर। जबकि बांग्लादेश इस सूची में सोलहवें स्थान पर है और म्यांमार चौदहवें स्थान पर। असफल राष्ट्रों की सूची में नेपाल और श्रीलंका भी है, लेकिन नेपाल में फिलहाल स्थिति सामान्य है और वहां अब निर्वाचित सरकार कामकाज चला रही है। लेकिन श्रीलंका में तमिल विद्रोहियों का संघर्ष आज भी लगातार जारी है।
-लेखक ‘दैनिक भास्कर,’ भोपाल में समाचार संपादक हैं।