संपादकीय. अमेरिका में आई मंदी का असर जिस व्यापकता से पूरी दुनिया पर पड़ा है, उससे भारतीय अर्थव्यवस्था कितनों दिनों तक बची रह सकती है, यह सवाल लोगों को परेशान कर रहा है।
चर्चाओं और अफवाहों का बाजार हालांकि पूरी दुनिया में इन दिनों गर्म है, लेकिन भारत में जिस तरह नकदी के संकट की बात होने लगी है और कुछ निजी बैंकों के अधिकारी स्पष्टीकरण जारी कर रहे हैं, सेंसेक्स गोते लगा रहा है, उसकी वजह से वित्त मंत्री पी. चिदंबरम को हस्तक्षेप करना पड़ा। वित्तीय संकट के कारण उपजी अनिश्चितता के दौर को थामने और लोगों को भरोसा दिलाने के लिए वित्त मंत्री ने आश्वस्त किया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में कोई गड़बड़ी नहीं है और सब कुछ ठीक तरीके से पटरी पर चल रहा है।
नकदी की स्थिति को सुधारने की दिशा में काम चल रहा है और हालात के मद्देनजर जल्दी ही जरूरी कदम उठाए जाएंगे। गौरतलब है कि पिछले नौ महीनों में सेंसेक्स 21 हजार के स्तर से घटकर 11 हजार पर पहुंच चुका है और अमेरिकी मंदी की मार का असर पूरी दुनिया पर जिस तरीके से पड़ा है, उसकी वजह से वैश्विक स्तर पर नकदी की समस्या पैदा होना तय है।
पहला सवाल तो यह है कि वित्त मंत्री ने जो भरोसा दिलाया है उससे बाजार और अर्थव्यवस्था पर कितना असर पड़ेगा? दूसरा यह कि जिन आधारों पर वित्त मंत्री सब कुछ पटरी पर होने की बात कर रहे हैं वह क्या वाकई ठीक है? क्योंकि भारत का आम आदमी अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई को यूं ही लुटते हुए बर्दाश्त नहीं कर सकता। इसलिए वित्त मंत्री ने मीडिया के माध्यम से जनता को आश्वस्त किया है कि बैंकों में जमा उनका धन सुरक्षित है और इसको लेकर किसी तरह की चिंता करने की जरूरत नहीं है। उनके आश्वासन का सकारात्मक असर शेयर बाजार पर भी पड़ा और सेंसेक्स में कुछ बढ़त दर्ज की गई। यहां यह ध्यान रहे कि भारत के अभी तक के इतिहास में कभी कोई बैंक दिवालिया नहीं हुआ है, आगे भी इसकी आशंका कम ही है।
यदि ऐसा कुछ होता है तो सरकार आगे आ सकती है। जिन बैंकों का अमेरिकी बाजार में बड़ा एक्सपोजर है, उन्हें नुकसान की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। भारतीय स्टेट बैंक और आईसीआईसीआई बैंक का अमेरिकी बाजार में थोड़ा एक्सपोजर है, लेकिन इतना नहीं जिससे किसी बड़े नुकसान की आशंका हो। भारत के बाकी किसी सरकारी और निजी बैंक का अमेरिका या अंतरराष्ट्रीय बाजार में बहुत पैसा नहीं लगा है। कई आर्थिक विश्लेषकों की राय भी वित्त मंत्री के पक्ष में जाती है और उनकी बातों में दम है। इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि अमेरिकी मंदी के कारण भारतीय बाजार में जो आशंका और अफरा-तफरी का माहौल है, उसमें सुधार आएगा।