bhaskar Web English
HomeManoranjanCinemaBollywood Bollywood

ये दुनिया जादू का खिलौना है

परदे के पीछे. संजय लीला भंसाली, रितिक रोशन और रनवीर कपूर के साथ फिल्म बनाना चाहते हैं। मनोरंजन उद्योग में पहले खाया हुआ घी, आज काम नहीं आता। भंसाली ने ‘हम दिल दे चुके सनम’, ‘देवदास’ और ‘ब्लैक’ जैसी सफल फिल्में दीं परंतु आखिरी फिल्म ‘सांवरिया’ बहुत बड़ी असफलता रही। दो खानदानी सितारे, सुपरहिट संगीत और सोनी जैसी अंतरराष्ट्रीय कंपनी के अपार साधन होते हुए भी भंसाली साहब ने आत्मरति में लीन रहते हुए ‘सांवरिया’ बनाई।

जिसे दर्शकों ने न केवल अस्वीकार किया वरन् नफरत भी की। आज संजय भंसाली के लिए बिना पूरी पटकथा सुनाए कोई भी सितारा अनुबंधित करना आसान नहीं है। उनका पहले का रुतबा खत्म हो गया है। यह घोर असफलता की कीमत है जो उन्हें चुकाना पड़ रही है और अपनी वास्तविक स्थिति को समझने में भी उन्हें अभी समय लगेगा।

इस निर्मम उद्योग में हर शुक्रवार व्यक्ति की हैसियत तय होती है। ‘सांवरिया’ के प्रदर्शन के पूर्व एक गोष्ठी में राकेश रोशन ने भंसाली से पूछा कि वे रितिक के साथ कब फिल्म शुरू करेंगे। आज रितिक मिलना आसान नहीं होगा। उन्हें पहले पूरी पटकथा सुनाना होगी और मार्केट का मेहनताना भी देना होगा।

रनवीर उनका शार्गिद रहा है, परंतु यहां भी पूरी औपचारिकता का निर्वाह करना होगा। रनवीर उनकी सरहदी गांधी से प्रेरित फिल्म पहले ही अस्वीकार कर चुका है। आज उद्योग में समय पैसा बन चुका है और भंसाली एक दिन में दो या तीन से अधिक शॉट नहीं लेते जबकि आदित्य चोपड़ा 65 दिनों में भव्य फिल्म पूरी कर लेते हैं। आज भी लोग परफेक्शन चाहते हैं परंतु निर्माण पूर्व की तैयारी इतनी सघन होना चाहिए कि कम समय में गुणवत्ता प्राप्त हो।

बहरहाल सुना है कि भंसाली साहब की फिल्म के दोनों नायक जादूगर हैं और यह यकीनन कॉमिक्स के जादूगर मैनड्रेक की कहानी नहीं है। क्या यह संभव है कि ये हॉलीवुड की फिल्म ‘प्रीस्टेज’ से प्रेरित है। इस फिल्म में गुरु और शार्गिद जादूगर हैं और गुरु का ख्याल है कि शार्गिद की चूक से उसकी पत्नी की मृत्यु हुई। ये उस तमाशे में हुआ जिसमें जल के भीतर हथकड़ी खोलकर बाहर आना था। जादू के खेल के तीन भाग होते हैं-वस्तु दिखाना, गायब करना और पुन: अवतरित करना। इस तीसरे महत्वपूर्ण भाग के बिना ट्रिक का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि दर्शक इसी एक्ट पर ताली बजाता है।

‘प्रीस्टेज’ का महत्वपूर्ण भाग है मनुष्य को गायब करना और पुन: प्रस्तुत करना। बिजली की चकाचौंध में दर्शक देख नहीं पाता कि मनुष्य स्टेज पर पहले से गढ़े द्वार द्वारा नीचे गिर जाता है और तलघर में चोर रास्ते से तीसरे एक्ट के लिए स्टेज के विंग्स पर पहुंच जाता है। फिल्म में गुरु ऐसा षडयंत्र रचता है कि उसके ‘गायब’ होने पर उसकी मृत्यु का भ्रम रचा जाता है और शिष्य पर कत्ल का मुकदमा चलता है। फांसी के कुछ क्षण पूर्व गुरु छद्मवेश में शार्गिद को मिलने आते हैं ताकि उसकी पीड़ा बढ़े, यह जानकर कि वह उस गुनाह की सजा पा रहा है जो उसने किया ही नहीं।

यह एक अत्यंत पेचीदा फिल्म है और इसका भारतीय संस्करण एक चुनौती हो सकता है। अगर गुरु शार्गिद को धार्मिक मठ के पात्र के रूप में स्थापित करें और पूरा जादूवाला प्रकरण हठयोग है तो संभवत: भारतीय दर्शक धर्म की शकर में लपेटे जादू को स्वीकार कर लेंगे। याद कीजिए विजय आनंद की ‘गाइड’ का क्लाइमैक्स कैसा था जब अध्यात्म के आवरण में गुरु बारिश होते ही मृत्यु में लीन हो जाते हैं। हो सकता है कि भंसाली की कहानी कुछ और हो।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: