इंदौर. शहर के मंदिरों, धर्मशालाओं और छतों पर शरद पूर्णिमा मनाई जाएगी। यहां श्रद्धालुओं की भीड़ लगेगी। कई समाजों द्वारा शरद पूर्णिमा को मिलन समारोह के रूप में मनाया जाएगा। इस दौरान सांस्कृतिककार्यक्रम और पुरस्कार वितरण भी किए जाएंगे।
आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। परंपरा के मुताबिक शाम को खीर-पूड़ी बनाकर भगवान को भोग लगाया जाएगा और इस भोग को छत पर रखकर भगवान का भजन किया जाएगा। रातभर चांदनी में रखने के बाद अगले दिन इसे प्रसाद के रूप में खाया जाएगा।
पंडितों के मुताबिक पूर्णिमा का व्रत करकेकहानी सुननी चाहिए। कथा सुनते वक्तएक लोटे में जल, गिलास में गेहूं, दौनों में रोली तथा चावल रखें। गेहूं के 13 दाने हाथ में लेकर कथा सुनना चाहिए। फिर गेंहू के गिलास पर हाथ फेरकर पंडिताइन या बुजुर्ग महिला के पांव छूकर गिलास उसे दे दिया जाता है। लोटे के जल का रात को अध्र्य दिया जाता है। विवाह के बाद पूर्णमासी का व्रत करने के लिए शरद पूर्णिमा से ही शुरुआत की जाती है। कार्तिक का व्रत भी शरद पूर्णिमा से ही प्रारंभ किया जाता है।
सभी ग्रहों की समान आवृत्ति : पीपल्स फॉर एग्रीकल्चर एंड ग्लोबल एजुकेशन एंड इनवायरमेंट (पेज) के डायरेक्टर समीर व्यास ने बताया शरद पूर्णिमा के दिन सभी ग्रह की आवृत्ति एक हो जाती है। इससे पृथ्वी में आंतरिक कंपन होने से वृक्ष, पौधों और बीजों पर अनुकूल असर पड़ता है, यह समय बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त रहता है। पर्यावरणविद् विनीत भटनागर कहते हैं वैज्ञानिकों ने भी इस तथ्य को माना है कि शरद पूर्णिमा के वक्त कास्मेटिक ऊर्जा बढ़ जाती है, इससे पौधों में तेजी से वृद्धि होती है। इसका प्रभाव, वनस्पति और कृषि पर सकारात्मक रहता है। इस पर्व पर प्रकृति खुशनुमा रहती है और बीज का अंकुरण भी अच्छा होता है।
..और हो जाता है आई टेस्ट : चांदनी रात में कई परिवारों में सूई में धागा पिरोने की परंपरा है। सुखलिया के डॉ. एल.एन. शर्मा बताते हैं वास्तव में यह व्यर्थ की खोखली परंपरा नहीं है बल्कि इससे आई टेस्ट (नेत्र ज्योति का परीक्षण) हो जाता है। यदि चंद्रमा के उजाले में आसानी से सूई में धागा पिरो दिया जाता है तो उसे भाग्यशाली समझा जाता है। भाग्यशाली का मतलब यही हुआ कि आंखें ठीक हैं।
महाराष्ट्रीयन समाज : महाराष्ट्रीयन समाज में शाम को महालक्ष्मी पूजन होगा। इसके साथ ही दूध में देर रात को चंद्र दर्शन किए जाएंगे। लोकमान्यनगर निवासी अर्पणा ठाकुरद्वारे केअनुसार समाज में लोग अपनी परंपरा अनुसार महालक्ष्मी पूजन करते हैं। परिवार की ज्येष्ठ संतान को तिलक लगाकर आरती भी उतारी जाती है।
माहेश्वरी समाज : माहेश्वरी समाज के लोग परिवार में एकत्रित होते हैं। साबूदाने की खीर बनाकर खुली रख दी जाती है और देर रात को इसे ग्रहण करते हैं। व्यंकटेशनगर निवासी राजकमल माहेश्वरी के अनुसार ‘चापड़ा’ का विशेष महत्व है।
चित्तौड़ा महाजन समाज : एम.ओ.जी. लाइन निवासी निर्मला गुप्ता ने बताया चित्तौड़ा महाजन समाज में दूध पात्र (मिट्टी के या अन्य कोई पात्र) में रखकर खुली चांदनी में रखा जाता है तथा उसकी पूजा भी की जाती है। अग्रवाल, नीमा, ब्राrाण, सहित अन्य कई समाज में दूध-खीर में देर रात को चंद्रदर्शन का विशेष महत्व है।
इसलिए मनाते है शरदोत्सव : शरदपूर्णिमा शरदऋतु का आगमन है, इसके स्वागत के लिए शरदोत्सव मनाया जाता है। डॉ. नारायणदत्त शास्त्री के अनुसार शरदपूर्णिमा के दिन मध्यरात्रि को चंद्रकिरणों से ‘अमृत’ बरसता है। वनस्पति में भी चंद्रकिरणों से अमृतरूपी वर्षा होती है। कार्तिक स्नान भी आरंभ होता है।