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जो है, जैसा है स्वीकार करना ही होगा

विकास मंत्र. ताश खेलना लगभग हर कोई जानता है। जी हां, आप भी। तो क्या आप मुझे इस खेल से जुड़ी कोई एक भी ऐसी घटना बता सकते हैं, जब बाजी बांटी गई हो और आपने अपने पत्ते देखने के बाद कहा हो कि ‘मुझे यह पसंद नहीं है।

मुझे दूसरे पत्ते दो।’ मैं जानता हूं कि आपका उत्तर ‘नहीं’ में होगा। सोचिए कि यदि हर कोई हर बार अपनी-अपनी पसंद के पत्ते मांगने लगे, तो फिर ताश का खेल होगा कैसे? या फिर यह कि यदि किसी को उसके मनमाफिक पत्ते दे दिए जाएं और फिर वह जीत भी जाए, तो उसकी जीत के जयकारे कौन लगाएगा? कोई भी नहीं न। यानी कि उसकी जीत, जीत होकर भी जीत नहीं रह जाएगी।

दोस्तो! हम सबकी जिंदगियों में भी यही होता है। आप ईश्वर से यह नहीं कह सकते कि ‘मुझे यह-यह दो, तो मैं यह करके दिखा दूंगा।’ उसने तो ताश के पत्तों की तरह हम सभी के हाथों में स्थितियां थमा दी हैं। यदि हमें ताश का खेल खेलना है, तो हमें इन्हीं पत्तों से खेलना है, जो हमारे हाथों में हैं। दूसरे पत्ते मांगने का या फिर ताश के बांटने में हेरा-फेरी करने की शिकायत करने का कोई अर्थ नहीं होता।

यह जिंदगी का गजब का एक ऐसा फलसफा है, जिसे जान लेने के बाद हमारे अंदर एक चट्टानी स्थिरता आ जाती है। भ्रम की, द्वंद्व की, शिकायतों की और विकल्पों की सारी छोटी-बड़ी बल्लियां अपने-आप गिर जाती हैं। जब ऐसा हो जाता है, तो हमारे पास जो कुछ भी होता है, वही हमारे लिए सब कुछ हो जाता है। जैसे ही हमारे अंदर यह सोच जन्म लेती है, वैसे ही हमारी सारी बिखरी हुई शक्तियां एकजुट होकर हमारी क्षमता को कई-कई गुना बढ़ा देती हैं, इतना बढ़ा देती हैं कि हमें देखकर यह आश्चर्य होने लगता है कि ‘क्या सचमुच में यह मैं ही हूं।’
-लेखक समय एवं जीवन-प्रबंध के विशेषज्ञ हैं।





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