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ताकि नदियां सदानीरा व पुण्यदायिनी बनी रह सकें!

नदियों को न्याय दिलाने के लिए महात्मा गांधी के जन्मदिवस पर राजस्थान के भीकमपुरा में कुंभ शुरू हुआ। इसमें नदी पुनर्जीवित करने वाले ऐसे लोग शामिल हुए, जो भारत की देवीशक्ति के नायक हैं।

इसी नाते नवरात्र स्थापना के दिन ही कुंभ स्थापना हुई। देश और दुनियाभर के लोगों ने तरुण आश्रम भीकमपुरा में इकट्ठे होकर मूल अभिप्राय रूप में पुन: कुंभ शुरू किया है। इस कुंभ में सब देवता ही थे, जिन्होंने त्याग किया जीवनभर अपनी श्रमनिष्ठा से जल बचाने, जंगल बढ़ाने, नदियों को पुनर्जीवित करने तथा नदियों में प्रदूषण, शोषण और अतिक्रमण रोकने हेतु अभियान चलाने या फिर गंगा मां की मुक्ति कराने में जुटे लोग ही कुंभ में जुटे हैं। इन सबने ही कुंभ में जुटकर नदियों को न्याय दिलाने वाली नीतियां बनाईं।

गंगा मां की गोमुख से गंगा सागर तक की जलयात्रा में विकसित हुई नदी नीति का आधार बिंदु निम्न तथ्य बने। इसमें तय हुआ कि राष्ट्रीय ध्वज, पशु-पक्षी आदि प्रतीक की भांति ‘गंगा एक राष्ट्रीय नदी’ के रूप में घोषित एवं संरक्षित करने का संकल्प हो। प्रदेश भी अपनी एक मुख्य नदी को प्रादेशिक नदी के रूप में घोषित एवं संरक्षित करे। केंद्र व प्रदेश अपनी क्रमश: राष्ट्रीय तथा प्रादेशिक नदी नीति बनाएं। नदियों के भू-उपयोग व स्वामित्व में कभी भी किसी भी प्रकार का भू-परिवर्तन वैधानिक तौर पर मान्य न हो। प्रत्येक नदी विशेष हेतु विशेष पारिस्थितिकीय प्रवाह के मानक निर्धारित हों और हर स्थिति में उसकी पालना सुनिश्चित करने की व्यवस्था बने।

नदी प्रदूषण नियंत्रण के लिए सरकार, स्थानीय समुदाय, पंचायत, नगरपालिका व स्वयंसेवी संगठनों के प्रतिनिधियों को जोड़कर नादीवार निगरानी इकाइयों का गठन एवं उन्हें कार्रवाई के वैधानिक अधिकार दिए जाएं। नदियों के प्रदूषण नियंत्रण की जवाबदेही तय करें। जल प्रदूषण से होने वाली बीमारी व मौतों के मामलों के न सिर्फ प्रदूषकों, बल्कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए जवाबदेह नियंत्रण तंत्र के खिलाफ दीवानी अदालतों को मुकदमा चलाने का प्रावधान हो। आखिरकार किसी की हत्या करने वाला सिविल कोर्ट में सिर्फ जुर्माना भरकर कैसे बच सकता है। नदी में मैला डालना एक बड़ा प्राकृतिक अपराध है।

अत: यह सुनिश्चित हो कि ग्राम पंचायतें, नगर निगम व पालिका अपने सीवरेज कचरे को बगैर शोधित किए नदी में कदापि नहीं डालें। पूरे देश में जल शोधन की एक जैसी प्रणाली कारगर नहीं हुई है। अत: स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार स्थानीय समाधान व संसाधन को प्राथमिकता दें।

प्रत्येक नदी के सर्वोपरि बाढ़ बिंदु के दोनों ओर कम से कम सौ मीटर चौड़े क्षेत्र को व्यापक स्तर पर हरी घास तथा स्थानीय जैवविविधता का सम्मान करने वाली वनस्पति के सघन क्षेत्र के रूप में संरक्षित एवं संवर्धित किया जाए। सरकार जनसहमति से नदियों के ऊपरी, मध्य व निचले छोरों में पानी की प्रकृति व उपलब्धता के अनुसार बसावट, उद्योग व खेती की सीमा व प्रकार का निर्धारण हो। सरकार देश की आर्थिक व ऊर्जा की सारी जरूरतों को पूरा करने के लिए सिर्फ सेज और जल विद्युत पर पूरा जोर लगाने के बजाय विकास व ऊर्जा के अन्य विकल्पों को भी बराबर तवज्जो दे और उसी के अनुरूप निवेश बढ़ाए।

सनातनधर्मियों की मान्यता के अनुसार हम जिनकी पूजा करते हैं, वे नदियों की अधिष्ठात्री देवियां ही हैं। अत: पवित्र नदियों में मलमूत्र का विसर्जन पाप माना जाता है। नदियों के जलप्रवाह से नदियों के तट में अवस्थित तालाब, कुएं आदि भी प्रभावित होते हैं। नदियों के जल से वृक्ष जीवित रहते हैं। इनके जल का सिंचन हमें शुद्ध अन्न प्रदान करता है। इस पवित्र जल को कुंभ में रखकर तथा समस्त नदियों का आह्वान कर ही हमारी पूजा प्रारंभ होती है।

दुख का विषय है कि अंग्रेजों के राज से ही बड़े-बड़े कारखानों और गंदी नालियों का जल नदियों में पहुंचाकर उन्हें प्रदूषित किया जा रहा है। आज भी नदियों का प्रवाह बांधों से रोककर तथा बिजली के लिए बैराजों में डालकर नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों के निवासियों को जलसंकट में डाला जा रहा है। हम भूल गए हैं कि जल का संपर्क भूमि से कटते ही उसकी गुणवत्ता क्षीण होने लगती है।

नदियों को पर्यावरणीय व नैसर्गिक प्रवाह मिले, इस हेतु एक प्रभावी नीति तैयार करना ही इस कुंभ का लक्ष्य है। गंगा राष्ट्रीय महत्व की प्रतीक नदी बने, यह अमरत्व प्रदान करने वाली नदी बनी रहे। इससे धरती-प्रकृति से मानव प्रेम मजबूत होगा। मानव और प्रकृति का सहअस्तित्व कायम रखने वाली प्रक्रिया सफल होगी। प्रकृति और मानव के बीच समतामूलक और सहअस्तित्व कायम रखने वाली नीति बनाना ही भीकमपुरा में आयोजित कुंभ का उद्देश्य है।

परंपरागत कुंभ का मूल उद्देश्य यही था। कुंभ में करोड़ों लोग इकट्ठा होकर अपनी-अपनी धरती व प्रकृति की समृद्धि कायम रखने के लिए कुंभ कलश अमृत प्रदान करें। सरकार, समाज और हम जब कुंभ में इकट्ठे हों, तो स्नान करना लक्ष्य नहीं रहे, बल्कि जिसमें स्नान कर रहे हैं वह नदी स्नान करने योग्य बनी रहे, आचमन एवं पुण्यदायिनी बनी रहे।
- लेखक मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित हैं।





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