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कानून के दायरे में सह-जीवन

दृष्टिकोण. relation हमारे दोस्त बताते हैं कि कनाडा में ऐसा कानून है कि अगर दो लोग दो साल या इससे ज्यादा वक्त तक एक साथ रह रहे हैं, तो उनके बीच मियां-बीवी का रिश्ता मान लिया जाता है। अब मुंबई में इस तरह की बात चल रही है, तो मैं एक ही बात सोच रहा हूं कि क्या रिश्तों को जोड़ने और तोड़ने के लिए किसी कानून की जरूरत होनी चाहिए? क्या इंसान के अंदर की ईमानदारी और कमिटमेंट निबाह लेने के लिए काफी नहीं हैं? लिव इन हो या पक्के मंत्र पढ़कर बनाया गया साथ रहने का इंतजाम, दोनों में सबसे ज्यादा जरूरी तो ईमानदारी ही है।

आज बड़े शहरों में लोग इस तरह साथ रहने लगे हैं जिसे लिव इन कहा जाता है। इसमें एक अच्छी बात तो यही है कि कोई एक दूसरे का मालिक नहीं होता। एक साथ रहने का फैसला इसलिए नहीं लिया गया होता कि वे किसी बंधन में हैं। इसके उलट हम विधिवत शादी की बात करें, तो पहले दिन से पुरुष, स्त्री का स्वामी बन गया होता है। हैरान कर देने वाली बात यह भी है कि आज तक इस बात पर किसी ने एतराज भी नहीं जताया। किसी औरत ने पलटकर यह नहीं कहा कि यह शब्द हटाओ। मैं किसी की मिल्कियत नहीं हूं। मेरा कोई स्वामी नहीं है, हां साथी हो सकता है।

यह शादी है क्या? दिखता है कि यह पूरी तरह एक कानून और व्यवस्था है, जिसके तहत दो अजनबियों को एक साथ रहने की इजाजत मिल जाती है। उनसे उम्मीद की जाती है शादी की पहली ही रात एक ऐसा संबंध बना लेने की, जो एक और अजनबी को पैदा करके उनकी जिंदगी में अजनबियत का जंगल खड़ा कर देगा। ऐसा होता भी है। तो इनके बीच में रिश्ता नहीं, कानून रहता है। व्यवस्था रहती है और उस व्यवस्था को अक्सर निभाया ही जाता है, जिया नहीं जाता।

इस बात से इत्तफाक न रखने वाले लोग काफी हो सकते हैं, लेकिन ध्यान से देखें तो सच यही दिखेगा। एक औरत और मर्द के बीच पहले रिश्ता हो और बाद में साथ रहने की व्यवस्था, क्या ऐसा होता है हमारे समाज में? रिश्ता जोड़ने के नाम पर ज्यादा से ज्यादा हम एक-दूसरे को देखने जाते हैं शादी से पहले। एक-दूसरे के परिवार के बीच परिचय होता है, एक-दूसरे की संपत्ति की पहचान करते हैं और इस बात को मापते हैं कि इस तरह जुड़ने में कितने फायदे और नुकसान हैं। इसके बाद शादी हो जाती है।

बहुत हुआ तो इस बीच लड़का-लड़की को मिलने की इजाजत मिल जाती है, जहां वे पूरी तरह से नकली होकर एक-दूसरे को प्रभावित करने की कोशिश करते रहते हैं। इसका नतीजा क्या होता है? एक झूठ को आप सच समझने की भूल करते हैं और बाद में जब सच सामने आता है, तो सब सपने टूटते लगते हैं। जब ऐसा ज्यादातर मामलों में हो ही रहा है, तो क्या अर्थ है उस व्यवस्था का जिसे शादी कहते हैं? जिस कानून की हम बात कर रहे हैं अगर वह बनता भी है तो उससे इतनी मदद होगी कि पुरुष, स्त्री को छोड़कर भागने से पहले एक बार सोचेगा जरूर और अगर चला भी गया, तो कम से कम पीछे छूट गई औरत उस सामाजिक प्रताड़ना से बच जाएगी जिससे वह अब गुजरती है। इसके बावजूद मेरा यही मानना है कि जो आदमी किसी को छोड़कर जा सकता है, क्या वह उस रिश्ते में ईमानदार था? अगर नहीं, तो ऐसे आदमी की पत्नी कहलाने में किसे गौरव महसूस होता है? हां, इसके आर्थिक पहलू जरूर मायने रखते हैं।

इस संदर्भ में एक बात और कही जा सकती है कि गैर जिम्मेदार और बेईमान आदमी चाहे लिव इन रिलेशनशिप में हो या शादी की व्यवस्था में, उसका कुछ नहीं किया जा सकता। सामथ्र्य पुरुष को अराजक बनाती है और वे चाहे छिपकर इस तरह के संबंध बनाएं या खुलकर, उन्हें बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। मुंबई की ही बात लें, तो दिखता नहीं है क्या कि किस तरह सक्षम लोग एक से ज्यादा संबंध जीवन भर आराम से चलाते रहते हैं।

उन्हें कभी न तो प्रताड़ित किया जाता है और न ही उन्हें किसी कानून की जरूरत होती है, क्योंकि ये सामथ्र्यवान हैं, तो अपनी जिंदगी में आई औरत के लिए आर्थिक व्यवस्था कर देना इनके लिए मुश्किल नहीं होता। यानी इस कानून की जरूरत मध्यमवर्ग के लिए ही हुई न। वही मध्यमवर्ग तो शादी को सात जनम का बंधन मानकर चलता है और अब लिव इन के नए खाके में फिट होकर जिंदगी के अर्थ ढूंढ़ता है, लेकिन अहम सवाल अब भी बाकी है अगर कानून लिव इन को पति-पत्नी के दर्जे की स्वीकृति दे भी दे, तो क्या इससे लोगों के अंदर ईमानदारी और जिम्मेदारी पैदा हो जाएगी..?

याद रखने की बात है कि एक ऐसी व्यवस्था कानून जरूर दे सकता है जो साथ रहने को वैध कर दे, लेकिन ऐसे जज्बात तो अपने अंदर ही पैदा करने होंगे, जो इस साथ को रिश्ते का नाम दे सकें। मैं तो यह भी कहता हूं कि ईमानदारी सिर्फ साथ रहने में नहीं, एक-दूसरे का साथ छोड़ने में भी होनी चाहिए। अगर आप रिश्तों को निबाह पाने में असमर्थ हैं, तो बेईमानी करने से बेहतर है कि साफ कह दिया जाए, लेकिन देखने में यही आता है कि लोग बरसों- बरस उन रिश्तों को ओढ़ते-बिछाते रहते हैं जो दरअसल रिश्ते रह ही नहीं गए होते।

गुलजार की बात को अगर यहां जोड़ दें तो क्या गलत है कि सिर्फ अहसास है ये रूह से महसूस करो! कहने वाले कह सकते हैं कि सिर्फ महसूस करने से तो पेट नहीं भर जाता, लेकिन मैं तो अपना उदाहरण देकर ही बता सकता हूं कि अहसास सबसे बड़ी चीज है और अगर आपमें ईमानदारी और निष्ठा है, तो फिर उस आदर्श समाज की कल्पना आराम से की जा सकती है, जिसमें किसी कानून की जरूरत हो ही नहीं। सारी बात अपने जमीर को जगाए रखने की है।
- इमरोज प्रसिद्ध चित्रकार और कवि हैं। (जैसा उन्होंने शायदा को बताया)





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