संपादकीय. चुनाव आयोग ने राजस्थान सहित पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कर दी है। इस घोषणा के साथ ही प्रदेश में चुनाव की गहमागहमी का आगाज हो गया है।
राजस्थान में विधानसभा की दो सौ सीटों के लिए चार दिसंबर को मतदान होगा, लेकिन मतगणना दूसरे राज्यों के साथ ही आठ दिसंबर को होगी। प्रदेश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर जहां वर्तमान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के नेतृत्व में चुनाव लड़ने जा रही है, वहीं कांग्रेस अभी भी भावी मुख्यमंत्री के नाम को लेकर ऊहापोह की स्थिति में ही है। इस बार इन दोनों प्रमुख दलों के अलावा बहुजन समाज पार्टी भी प्रदेश की सभी सीटों पर पूरी तैयारी के साथ चुनावी समर में उतर रही है। यह पार्टी तो अभी तक अपने एक सौ अट्ठासी उम्मीदवारों की घोषणा भी कर चुकी है।
राज्य में विधानसभा के पिछले चुनाव में पहली बार भाजपा ने दो सौ में से एक सौ बीस सीटों पर कब्जा कर लिया था और तत्कालीन सत्तारूढ़ कांग्रेस को महज छप्पन सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था। बहुजन समाज पार्टी को पिछले चुनाव में दो ही सीटें मिली थीं, जबकि तेरह सीटें निर्दलीय उम्मीदवारों के खाते में गई थीं। जनता दल भी दो सीटें ही हासिल कर सका था, तो मार्क्सवादी पार्टी व लोकजन शक्ति को एक-एक सीट पर जीत हासिल हुई थी।
राज्य में भले ही अपने पूर्ण बहुमत के आधार पर भाजपा ने पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया हो, लेकिन विवादों व जनसंघर्षो ने कभी भी इस सरकार का पीछा नहीं छोड़ा। इसी सरकार के कार्यकाल में राजस्थान ने अपने इतिहास का कदाचित सबसे गंभीर जातिगत तनाव भी झेला है। हालांकि मुकाबला भाजपा व कांग्रेस के बीच ही होगा, परंतु बसपा सहित अन्य दलों तथा निर्दलीय उम्मीदवारों के पिछले प्रदर्शन पर ध्यान दिया जाए तो इनकी भी प्रभावी भूमिका सामने आ सकती है।
उम्मीदवारों की हार-जीत का कयास लगाने वाले एक्जिट पोल पर चूंकि अब प्रतिबंध लगा दिया गया है, इसलिए मतदान करके निकलने वाले मतदाताओं की राय के आधार पर इस बार चुनावी रुझानों के बारे में बहस संभव नहीं होगी।
तमाम राजनीतिक दल शुरू से ही एक्जिट पोल पर प्रतिबंध लगाने के हामी रहे हैं और चुनाव आयोग ने दो साल पहले निष्पक्ष चुनाव का हवाला देते हुए चुनाव का अंतिम चरण पूरा होने से पहले एक्जिट पोल के नतीजों के प्रकाशन और प्रसारण पर रोक लगा दी थी, इसलिए इस बार किसी भी राजनीतिक दल के नेता यह आरोप नहीं लगा सकेंगे कि एक्जिट पोल के प्रकाशन-प्रसारण की वजह से उनके पक्ष में मतदान करने वाले मतदाता दिग्भ्रमित हुए।