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वेद में नहीं मिलता सती प्रथा का प्रमाण

रायपुर. सतीप्रथा वेद विरुद्ध है। वेदों में इस प्रथा का कोई प्रमाण नहीं है। मध्यकाल में जब पर्दाप्रथा, बलिप्रथा व बाल विवाह जैसी कुरीतियां फैली थीं तभी सती प्रथा को महिमा मंडित किया गया। यह कहना है डा. अजय आर्य का।

मोतीबाग में प्राणायाम-योगासन अभ्यास के दौरान उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की ग्रामीण जनता अभी भी अंधविश्वास में पड़ी है। सामाजिक बुराइयों के निमरूलन के लिए सामाजिक कार्यकर्ताओं को आगे आना चाहिए। आचार्य ने कसडोल के पास लालमति के सती होने का जिक्र करते हुए कहा कि सती प्रथा का वेदों में कोई प्रमाण नहीं है।

राजा राममनोहर राय ने अपनी विधवा भाभी के सती कराने का हृदयविदारक दृश्य देखा तो उनका हृदय फट गया। उन्होंने सतीप्रथा के खिलाफ अंग्रेजीराज में कानून बनावाया। आज भी भारत में सतीप्रथा कानूनन प्रतिबंधित है। इसका धर्म से कोई संबंध नहीं है। कई बार इसके समर्थक क्षत्राणियों का जिक्र करते हुए इसे जायज ठहराने की कोशिश करते हैं। विदेशी आक्रांताओं के सामने अपने शील बचाने महिलाएं आग में कूद जाती थीं, यह उनकी मजबूरी थी। उन्होंने पूछा कि सती होने की व्यवस्था पुरुषों के लिए क्यों नहीं है?

पुरुष क्यों नहीं होते सता? : आचार्य ने चुटकी लेते हुए कहा कि हम समाज में सती का समर्थन करते हैं सता का नहीं। महिलाओं को सती होने के लिए उकसाया जाता है, पुरुषों को नहीं। जो पुरुष सतीप्रथा को महिमा मंडित करते हैं वे अपने लिए इसे क्यों लागू नहीं करते? धर्म के नाम पर समाज महिलाओं को दोयम दर्जा देता है। वैदिक शास्त्र कहते हैं ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता’ यानी जहां नारी का सम्मान होता है, वहां देवताओं का वास होता है।

सती का महिमामंडन गलत
रायपुर. सती मामले की पुनरावृत्ति न हो इसके लिए डा. दिनेश मिश्र ने सामाजिक जागरूकता की जरूरत बताई है। उन्होंने कहा कि सती मामले को महिमा मंडित नहीं करना चाहिए व आत्मदाह करने वाली का स्मारक व मंदिर बनाने की बातें भी खत्म होनी चाहिए। इस बात को खास तौर पर गांवों में प्रचारित करने की जरूरत है कि विधवा होना कोई गुनाह नहीं है कि इसका प्रायश्चित्त करने पति के निर्जीव शरीर के साथ जलकर अपनी जान देना पड़े। महिलाओं पति के देहांत के बाद बच्चों के पालन-पोषण व शिक्षा-दीक्षा की जिम्मेदारी निभाती हैं। सामाजिक व सार्वजनिक जीवन में भी वे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।





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