Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood परदे के पीछे.
गौरतलब हैं फिल्म उद्योग की दो खबरें, यश चोपड़ा की संस्था ने विश्वप्रसिद्घ डिज्नी के लिए ‘रोड साइड रोमियो’ नामक एनिमेशन फिल्म बनाई है। जिसमें जानवर पात्रों के लिए करीना कपूर और सैफ अली खान ने अपनी आवाज दी है।
दीपावली पर यह फिल्म केवल मल्टीप्लैक्स में लगाई जाएगी। राजश्री फिल्म कंपनी अपनी फिल्म ‘एक विवाह ऐसा भी’ का प्रदर्शन केवल एकल ठाठिया थियेटर में करना चाहते हैं। फिल्मकार जानते हैं कि उनकी फिल्म के अवसर कहां बेहतर हैं और चोपड़ा तथा बड़जात्या इस खेल के पुराने माहिर हैं। महानगरों से कस्बों तक दो धड़ों में मुल्क बंट चुका है।
अनेक नगरों में बंटवारे की सरहद नवनिर्मित फ्लाई ओवर हैं। मुंबई महानगर में सरहद है लोकल ट्रेन, पश्चिम उपनगर आधुनिक हैं और पूर्व में सब कुछ पुराना है। यह ऊपर वाले की कृपा है कि सूरज का उजाला दोनों भागों में समान है परंतु रात में पश्चिम नीली रोशनी की बांहों में एक सपने सा नजर आता है और पूर्व टिमटिमाता है, परंतु यह रोशनी खुद की है। मनोरंजन जगत का अपना विश्वास है कि मल्टीप्लैक्स का दर्शक एकल ठाठिया सिनेमा के दर्शक से अलग है।
एक पॉपकॉर्न खाता है तो दूसरा मूंगफली चबाता है। फिल्म उद्योग में स्वयंभू विशेषज्ञ केवल महानगरों के लिए फिल्म बनाना चाहते हैं और बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के दर्शकों को पिछड़ा हुआ समझते हैं। दरअसल आज मुंबई में कोई भी फिल्मकार इतना योग्य नहीं है कि अखिल भारतीय सफलता अर्जित करने वाली फिल्म बना सके।
क्या सचमुच में दर्शक वर्ग दो धड़ों में बंट चुका है? क्या कुछ दृश्य केवल महानगरीय दर्शक को गुदगुदी करते हैं या कुछ फिल्में केवल ग्रामीण क्षेत्र में ही चल सकती हैं? क्या आज ‘मदर इंडिया’, ‘गंगा जमुना’ और ‘प्यासा’ केवल मल्टीप्लैक्स में सफल होंगी या ये केवल अंचलों में सफल होंगी? मनोरंजन उद्योग भावना का या उसके विवेचन का उद्योग है। क्या मनुष्य का हृदय बंट चुका है? क्या संवेदनाओं का भी ध्रुवीकरण हो चुका है?
‘मुन्नाभाई’, ‘भेजा फ्राय’ और ‘ए वेडनेसडे’ सारे भारत में सफल रही हैं। शायद हुआ यह है कि काफ्का के ‘आउटसाइड’ की तरह भावनाहीन रोबोनुमा मनुष्य हमारी व्यवस्था ने गढ़े हैं और ये केवल पॉपकॉर्न चबाने ही मल्टीप्लैक्स में जाते हैं। हमने सिनेमा को गैर सिनेमाई कारणों से देखने को प्रचारित किया है और सत्य की तरह स्थापित भी कर दिया है।
यश चोपड़ा की एनिमेशन फिल्म में एक अमीरजादों के घर पल रहा कुत्ता गरीबों की बस्ती में आ जाता है। आयात किए डॉग बिस्किट के बदले उसे कचरे के डिब्बे में खाना खोजना पड़ता है। अगर कथा सचमुच में यही है तो यह नितांत भारतीय सिनेमा है जिसे एकल ठाठिया में नहीं दिखाना गलत है। बड़जात्या की ‘विवाह’ दिल को छूने वाली फिल्म थी और सब जगह सफल थी।
‘एक विवाह ऐसा भी’ फिल्म में कतिपय कारणों से विवाह रुक जाता है परंतु प्रेम जारी है। कोई वजह नहीं है कि यह मल्टीप्लैक्स में नहीं चले। शायद हमारे फिल्मकारों के सोचने के ढंग पर विज्ञापन शक्तियों का प्रभाव पड़ चुका है। फ्लाइ ओवर, पूर्व-पश्चिम ये सारी सरहदें नकली हैं, भारतीय मन अविभाजित है। उसे तो पाकिस्तान बन जाने के बाद भी तोड़ा नहीं जा सका। फिल्मकार अपनी कमतरी को दर्शक पर थोप रहे हैं।