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वोकेशनल शिक्षा की जरूरत

मुंबई.इंटरनेट ने दुनिया भर में तमाम आयामों को ही बदल दिया है। इसकी मदद से आज का किसान बगैर कहीं आए-जाए पूरी दुनिया के मौसम की जानकारी या विशिष्ट उत्पाद की वैश्विक कीमतों जैसी बातों का आसानी से पता लगा सकता है। आज उसकी पहुंच उन सारी जानकारियों तक है, जो उसके पेशे और सर्वाइवल के लिए जरूरी हैं। ऐसे में आईटी के आगमन के बाद आज जरूरत फिजिकल मोबिलिटी को विकसित करने की है। उदाहरण के लिए सारी सुविधाओं युक्त एक पोर्टाे केबिन की कल्पना कीजिए जिसमें एक मोबाइल जेनरेटर लगा हो, जिसे एक जगह से दूसरी जगह तक ट्रैक्टर के हुक में फंसा कर ले जाया जा सकता हो।

इसका फायदा यह होगा कि जिस गांव या पंचायत में इसकी जरूरत होगी इसे वहां उपयोग में लाया जा सकेगा। हमारी शिक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसका 50 फीसदी हिस्सा थ्योरी और शेष प्रेक्टिल होता है। इस पोटरे केबिन का लोगों की प्रेक्टिकल जानकारी बढ़ाने में उपयोग किया जा सकता है। यह काम कठिन है लेकिन नामुमकिन नहीं है, अगर आप प्रेक्टिकल एप्रोच को बढ़ाना चाहते हैं तो इसके लिए थ्योरी के साथ वीडियो कंपोनेंट जोड़ना होगा। इससे स्थानीय लोग चीजों को कहीं अच्छे से समझ व्यावहारिक तरीके से ज्ञान का उपयोग कर सकेंगे। दो अलग-अलग माध्यमों का परस्पर प्रयोग समस्या का अंत तो करेगा ही साथ ही हर लिहाज से उपयुक्त भी रहेगा।

देश के अलग-अलग जिलों में ऐसे पाठ्यक्रमों को चलाया जा सकता है। अगर हम रोजगारपरक शिक्षा को वीडियो के साथ भी दिखाएं तो स्थिति में जबरदस्त बदलाव लाया जा सकता है। इसके बाद क्या मजाल कि हमारा देश अच्छे कारीगरों वाला देश न बन पाए। इस तरह की शिक्षा पर नजर रखने के लिए स्थानीय पंचायत को जिम्मेदारी लेनी होगी। पैसों के इंतजाम के लिए औद्योगिक समूहों को आगे आना होगा। जर्मनी और चीन जैसे देशों में वोकेशनल शिक्षा की शुरुआत उच्चतर माध्यमिक स्कूल से कर दी जाती है।

जबकि हमारे देश में ऐसे ढेरों बच्चे हैं जो इस स्तर तक पहुंचने के पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं। अगर हर वर्ष इन्हें एक या दो किस्म की वोकेशनल शिक्षा की ट्रेनिंग दी जाए तो यह इनके साथ-साथ देश के लिए भी फायदेमंद होगी। फंडा यह है कि जहां तक देश में वोकेशनल शिक्षा देने का सवाल है क्या हम अब भी जागने को तैयार हैं! हम अब भी इस बारे में सोच-विचार और सही प्रयास करके आगे बढ़ सकते हैं।





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