इलाहाबाद.इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम व्यवस्था देते हुए कहा है कि लोक अदालतों द्वारा पारित अवार्ड पर संविधान के दायरे में पुनर्विचार किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि लोक अदालतों के फैसले हालांकि अंतिम होते हैं, लेकिन यदि उन्हें किसी ने धोखेबाजी या गलतबयानी के आधार पर हासिल किया हो, तो फिर उस पर पुनर्विचार के लिए आग्रह किया जा सकता है।
जस्टिस सरबजीत यादव ने बुधवार को एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि पुनर्विचार का अधिकार सभी अदालतों, न्यायाधिकरणों और संवैधानिक संस्थाओं में निहित है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट को अनुच्छेद 227 के तहत अपने क्षेत्राधिकार में आने वाली सभी अदालतों या न्यायाधिकरणों के फैसलों की समीक्षा करने का अधिकार प्राप्त है।
जस्टिस यादव ने इस फैसले के साथ ही डॉ. शशि प्रतीक को सिविल जज के फैसले को चुनौती देते हुए इसके खिलाफ रिट याचिका दायर करने की अनुमति दे दी। डा. प्रतीक ने 30 अप्रैल 2006 को पारित एक अवार्ड पर पुनर्विचार करने के लिए सिविल जज को आवेदन किया था, जिसे खारिज कर दिया गया था।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने कहा था कि लोक अदालतों के अवार्ड अंतिम होते हैं और अनुच्छेद 226 के तहत उनके खिलाफ पुनर्विचार या उनकी समीक्षा के लिए अपील दायर नहीं की जा सकती है।