मुंबई.वैश्विक वित्तीय संकट के चलते कई ग्राहक निजी बैंकों में अपना धन जमा करने से बच रहे हैं। उन्हें अपनी बचत सरकारी बैंकों में रखना ज्यादा सुरक्षित लग रहा है। हालांकि भारतीय बैंकों में प्रत्येक खाते पर एक लाख रुपए की गारंटी होती है, लेकिन कई लोगों को इसकी जानकारी न होने से जमाकर्ता भ्रमित हो रहे हैं। इनके मन में यह आशंका घर कर गई है कि वैश्विक वित्तीय संकट के चलते देश के निजी बैंक कभी भी उलझ सकते हैं।
डिपाजिट पर बीमा बढ़ाने की मांग:
ये जमाकर्ता अब बैंक खाते में डिपाजिट पर बीमा की राशि बढ़ाने की मांग करने लगे हैं। पिछली बार डिपाजिट पर बीमे की राशि 1993 में बढ़ाई गई थी। पिछले पांच साल में घरेलू बचत दो गुने के करीब बढ़कर 9.85 लाख करोड़ रुपए हो चुकी है।
वैश्विक वित्तीय संकट के उभरने के बाद यूरोप, अमेरिका और आस्ट्रेलिया इस गारंटी को पहले ही बढ़ा चुके हैं, लेकिन भारतीय अधिकारियों ने यह कदम नहीं उठाया है। इन अधिकारियों का कहना है कि भारतीय बैंक अच्छी हालत में है।
विश्लेषक बोले:
इस बारे में रिजर्व बैंक के स्वामित्व वाले डिपाजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉपरे. के बोर्ड मेंबर प्रकाश जी. गुप्ते का कहना है कि अगर बचतकर्ता एक लाख रुपए से अधिक राशि पर प्रीमियम अदा करता है तो यह डिपाजिट पर बीमे की सीमा बढ़ाई जा सकती है।
आईआईएम बैंगलूर के प्रोफेसर आप्टे की राय में सरकार पूरी बचत राशि की गारंटी नहीं दे सकती है। लेकिन यदि बीमा प्रीमियम लेना शुरू किया जाता है, तो फिर किसी भी राशि का बीमा कराया जा सकता है।
सीमा बढ़ाई जाए:
वहीं वड़ोदरा स्थित एक प्लास्टिक निर्माता कंपनी में कार्यरत संजय शाह का मानना है कि प्रति खाता इस राशि को कम से कम 1.5 लाख रुपए किया जाना चाहिए।
गौरतलब है कि आरबीआई की वेबसाइट के अनुसार 1962 में कई बैंकों के विफल होने के बाद अमेरिका ने बैंक डिपाजिट पर बीमा शुरू किया था। उसके बाद भारत ऐसा दूसरा देश था, जिसने इस बीमे की शुरुआत की थी।