नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को पत्र लिखकर निचली कोर्ट में पदस्थ भ्रष्ट और अकुशल जजों की छंटाई करने का सुझाव दिया है। उन्होंने इसके लिए अनिवार्य स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को सहारा बनाने की भी सलाह दी है।
मंगलवार को लिखे अपने पत्र में जस्टिस बालकृष्णन ने कहा है, ‘अयोग्य, अकुशल, निष्प्रभावी जजों के अलावा ऐसे जजों के लिए भी न्याय प्रणाली में कोई जगह नहीं है, जिनकी ईमानदारी संदिग्ध हो।’ चीफ जस्टिस का यह पत्र हाल में सामने आए न्याय प्रणाली में भ्रष्टाचार के कुछ मामलों के संदर्भ में काफी अहम है। इनमें घर पर रिश्वत पहुंचाने के मामले में पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट के जजों के कथित रूप से शामिल होने और गाजियाबाद कोर्ट पेंशन घोटाले में कई मौजूदा व रिटायर्ड जजों की कथित तौर पर संलिप्तता के मामले शामिल हैं। आर्थिक अनियमितता के एक मामले में चीफ जस्टिस ने कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ महाभियोग चलाने की भी सिफारिश की है।
पत्र में चीफ जस्टिस ने कहा, ‘जनहित में ऐसे जजों को समय से पहले ही स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति दे देनी चाहिए।’ उन्होंने कहा है कि वीआरएस कोई कलंक नहीं है और ऐसे मामलों में कोई नागरिक प्रतिक्रिया भी नहीं होती। चीफ जस्टिस के मुताबिक, इसके लिए निचली अदालतों के जजों के सेवा नियमों को आवश्यकतानुसार इस तरह से सुधारा जा सकता है, ताकि उनके कामकाज का अतिरिक्त आकलन कारगर हो सके।
गौरतलब है कि ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन के मामले में शीर्ष कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों के कामकाज का उनकी उम्र के 58 साल से पहले मूल्यांकन करने के निर्देश दिए थे। जस्टिस बालकृष्णन ने कहा है कि इस तरह के मूल्यांकन जजों की उम्र के 50 और 55 साल से पहले भी होने चाहिए। चीफ जस्टिस के अनुसार, इससे जजों के व्यवहार पर नियंत्रण रखने में आसानी होगी।