देश में विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) के लिए खेती योग्य जमीन के जबरन अधिग्रहण पर प्रतिबंध को लागू होने से रोकने के प्रयासों को अधिसूचित इलाकों में विकास एजेंसियों को सेज के लिए जमीन अर्जित की इजाजत के प्रस्ताव से बल मिला है।
यह योजना सरकार के एजेंडे में है, जबकि हाल ही में सेज लॉबी किसानों को अपनी जमीन उनके साथ बांटने के लिए मनाने में नाकाम रही। हो सकता है यह भी इसकी एक वजह हो। मौजूदा दौर में सेज के लिए जमीन के ‘अनिवार्य अधिग्रहण’ से राज्य सरकारों को रोक दिया गया है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय का तर्क है कि अपने न्ययाधिकरण क्षेत्र में जमीनों को अधिसूचित और अर्जित कर उन्हें प्रयोक्ताओं को लीज पर देने वाली विकास एजेंसियों(जैसे कि डीडीए, एनओआईडीए और एपीआईडीसी) को सेज के लिए जमीन अधिग्रहण की इजाजत दी जानी चाहिए। मंत्रियों के समूह को अपने नोट में वाणिज्य मंत्रालय कहता है- ‘ऐसे निर्देश जारी करने का प्रस्ताव है कि विकास एजेंसियों द्वारा सेज के इस्तेमाल के उद्देश्य से जमीन का अधिग्रहण ‘अनिवार्य अधिग्रहण’ की श्रेणी में नहीं आएगा। इन मामलों में कोई व्यक्तिगत रूप से ऐसी गतिविधियों के लिए जमीन नहीं खरीद सकता।’
यह सांकेतिक रूप से जमीन के इस्तेमाल को खेतिहर से गैर-खेतिहर में बदलकर जमीन के जबरन अधिग्रहण के समान ही है। प्रतिबंध को कमजोर करने वाले इस प्रस्ताव और अन्य ऐसे प्रस्तावों को सेज के संदर्भ में लोगों की प्रतिक्रिया की रोशनी में जांचने की जरूरत है, खासकर रायगढ़ की जनता की राय को। रिलायंस के प्रस्तावित सेज को किसानों द्वारा सिरे से नामंजूर कर देना जमीन से उन्हें बेदखल करने के प्रति विरोध को रेखांकित करता है। किसानों और उद्योग जगत के बीच जमीन के लिए संघर्ष राज्य की ओर से जबरदस्त प्रतिक्रिया की मांग करता है, जो खुद से जुड़े सभी पक्षों के अधिकारों का सम्मान करता है। वैसे अब तक राज्य सरकारें उद्योग के पक्ष में और किसानों के खिलाफ ही नजर आई हैं।
राजस्थान का बाड़मेर इसकी बेहतरीन मिसाल है। यहां वसुंधरा राजे सरकार जिंदल समूह की ओर से एक बिजली व उत्खनन परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण करना चाहती थी। किसानों ने उनके इस कदम का जमकर विरोध किया। किसानों की इस मुहिम को स्थानीय सांसद मानवेंद्र सिंह का भी पूरा समर्थन मिला। इसके बाद एक समझौते का सुझाव दिया गया जिसके तहत अब किसान अपनी जमीन कंपनी को लीज पर देंगे, बजाय इसके कि यह उनसे छीन ली जाए। इस पर आगे काम चल रहा है।
जहां तक किसानों की बात है तो उनके लिए रायगढ़ और बाड़मेर के सबक बिलकुल साफ हैं, ‘यदि किसान एक संयुक्त मोर्चा गठित कर अपने अधिकारों की मांग करें तो सरकार को भी बातचीत की टेबल तक लाया जा सकता है।’
कुछ मामलों में, सेज पर आसक्त राज्य सरकारों ने केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों को भी नजरअंदाज कर दिया। चूंकि अब चुनाव करीब हैं, लिहाजा केंद्र ने राज्य सरकारों को आगाह कर दिया है कि वह ऐसी जमीनों पर सेज परियोजनाओं को मंजूर नहीं करेगा, जिनका जबरन अधिग्रहण किया गया हो। इसने भी कारपोरेट हितैषियों को जबरन जमीन अधिग्रहण पर प्रतिबंध को कमजोर करने के रास्ते व तौर-तरीके तलाशने से नहीं रोका।
टाटा के पश्चिम बंगाल के अनुभव ने कारोबारी घरानों के प्रति मीडिया में सहानुभूति जगा दी, जो उपजाऊ खेतिहर जमीन पर परियोजना स्थापित करना चाहते हैं। हालांकि टाटा के उपासक भी मानते हैं कि बंजर, बेकार पड़ी जमीनों पर परियोजनाएं स्थापित करने को तरजीह दी जानी चाहिए, लेकिन वे इस बात पर भी जोर देते हैं कि उद्योग जगत की जरूरतों को खेती की जरूरतों पर तरजीह दी जाए।
यही समस्या की जड़ है। जमीन खाद्यान्न उत्पादन का प्रमुख निर्धारक घटक है। वर्ष 1982 में जहां प्रति व्यक्ति के हिसाब से कृषि योग्य जमीन की उपलब्धता 0.27 हेक्टेयर थी, वहीं वर्ष 2003 में यह घटकर 0.18 हेक्टेयर रह गई। भारत दालों और तेलों का आयातक तो पहले से है और हाल ही में इसे विदेशों से गेंहू भी खरीदना पड़ा।
यदि भारत आयात-निर्भर नहीं बनना चाहता, तो खेती के लायक जमीन पर उद्योग और शहरी विकास के नाम पर हो रहे अतिक्रमण को जरूरी व व्यावहारिक परियोजनाओं तक ही सीमित रखना होगा। एक कार फैक्ट्री पूरी तरह इस श्रेणी में नहीं आती। इसके साथ-साथ किसानों की भावनाओं का भी ख्याल रखना होगा। जहां कुछ लोग नकदी के बदले अपनी पैतृक जमीन देने को तैयार हैं, वहीं कई लोग ऐसे भी हैं जो इसके लिए कतई राजी नहीं हैं। वे जमीन को आजीविका का स्थायी जरिया मानते हैं।
यह बिल अपने मौजूदा स्वरूप में ऐसा कोई भरोसा नहीं दिलाता कि जमीन को लेकर होने वाला संघर्ष रुक जाएगा। केवल फार्म सेक्टर के प्रति रवैए और किसानों की जरूरतों के प्रति संवेदनाओं में बदलाव से ही ऐसा हो सकता है।
-लेखिका सामाजिक मामलों की विशेषज्ञ हैं।