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सौंदर्य की बदसूरती

क्या यह बहुत डरावनी बात नहीं लगती की एक कमसिन उम्र की सौंदर्य सम्राज्ञी बेटी अपने माता-पिता की हत्या कर दे। वह भी सिर्फ इसलिए कि उसके माता-पिता उसे समझाइश देने के रूप में टोकते थे या अपनी अनुभवी समझ से उसे कुछ करने के लिए मना करते रहते थे।

एक दिन उस सुंदरी को यह बात इतनी असहनीय और नागवार गुजरी कि उसने अपनी सहेली के साथ मिलकर पहले तो मां का गला घोंटा और फिर बीच-बचाव करने आए पिता को भी उसने धक्का देकर गिरा दिया और उनका गला इतना दबाया कि वह भी मर गए। इस भयानक हिंसक कांड को अंजाम देते हुए पूरे समय सुंदरी की सहेली सहभागी रही। क्या बात बहुत गंभीर है। किशोर और युवा जिस मारक क्रोध और हिंसा की मानसिकता अपना रहे हैं, अनियंत्रित हो रहे हैं उसकी यह पराकाष्ठा है।

घटना मेरठ की है। मिस मेरठ चुनी गई सौंदर्य सम्राज्ञी ने प्रियंका अपनी सहेली के साथ मिलकर इस तरह की नृशंसता की। अपने माता-पिता को ही मार डाला। सुनते हैं कि जब किसी सुंदरी को सौंदर्य प्रतियोगिता में प्रथम आने पर ताज पहनाया जाता है तो उससे उसकी मानवीय संवेदनाओं, भावनाओं से संबंधित प्रश्न भी पूछे जाते हैं।

मानव सेवा के प्रति उसके दृष्टिकोण की जानकारी भी ली जाती है। ऐसा माना जाता है कि केवल सुंदरता काफी नहीं होती। सौंदर्य के साथ मन-बुद्धि और ज्ञान भी शामिल होना चाहिए। यह सौंदर्य प्रतियोगिताओं को जायज ठहराने का झूठा आडंबर है। हो सकता है कि यह सुंदरी भी शायद इस प्रश्न मंच पर खरी उतरी हो। यह कैसी सुंदरी है। हृदयविहीन, इतनी नृशंस की उसने अपने माता-पिता की ही हत्या करने का विभत्स कांड कर डाला।

केवल शारीरिक आकर्षण मानसिक स्वस्थता के बिना कितना कुरुप है। जिनकी बदौलत उसे सुंदरता मिली, जिनका आधार लेकर वह इस मुकाम तक पहुंची उन्हीं की हत्या करते समय उसके हाथ नहीं कांपे? हत्या का कारण भी क्या रहा? वे उसे उस राह पर चलने के लिए उस पर चलने के लिए उसे संतुलित होने और सोच-समझकर आगे बढ़ने को बार-बार निर्देश देते थे। क्या उसे खतरों से अगाह करना जायज नहीं था?

आज के खंडित, कुत्सित और बेगैरत वाले माहौल को देखते हुए उनका टोंकना बहुत जायज था। चकाचौंध भरी यह राह एक अंधेरी गहरी खाई तक भी पहुंचती है जिसमें गिरकर सिर्फ शोषण और उससे उपजी पीड़ा ही शामिल है। पिछले दिनों दिल्ली की सड़कों पर ऐसी ही एक सुंदरी बनी पूर्व मॉडल गीताजंली नागपाल लगभग विक्षिप्त और फटे हाल पड़ी मिली थी।

दोष किसे दें? दोष किसी एक पर न डालकर यह माना जाए दोष हम सब द्वारा बनाए गए उस माहौल का है जहां सुविधाओं का इंद्रजाल है। यह वह मायावी संसार है जो सिर्फ उपभोग को उकसाता है। सब कुछ पाना और भोगना है, देना कुछ भी नहीं है। हर वस्तु की हाईप क्रिएट की जा रही है, जिसमें उपभोक्तावाद शीर्षस्थ पर है। जब हर चीज को पाने की लालसा मदांध तब उसके साथ हिंसा आना बहुत स्वभाविक है। मनमर्जी का नहीं मिल रहा तो छीनों-झपटों। कोई बाधा बने तो उसे मार दो, कुचल दो। क्या पेरेंट्स की चिंता जायज नहीं थी।

अब तो इंतिहा हो गई। सौंदर्य वह भी बेटी का सौंदर्य इतना स्वार्थी हो गया कि माता-पिता ही बाधक लगने लगे। इस कुरुपता का क्या जवाब हो सकता है। बेटियों का कातिल हो जाना इस युग के पाप की पराकाष्ठा है।





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