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गुजर गया पर्चे, चर्चे और अघोषित खर्चे का दिन

चुनाव विशेष. पर्चा वापसी का अंतिम दिन। यानी बागियों से चर्चा का अंतिम अवसर। या अघोषित और अज्ञात तरह का खर्चा करने का तनावपूर्ण समय। विद्रोही प्रत्याशी ने बैठना स्वीकार किया तो अधिकृत उम्मीदवार जितनी राहत की सांस लेते हैं, उतनी ही संदेह की धुकधुकी शुरू हो जाती है। विद्रोही बैठ तो गए हैं लेकिन विरोध खड़ा ही रहेगा क्या? वह तो मान गया है किंतु मन का क्या?

गुरुवार को यही हड़कंप सभी जगह मचा। चूंकि सत्तारूढ़ भाजपा के भीतर भारी विद्रोह खड़ा हो गया था- इसलिए उनके दिग्गजों को दयनीय स्थिति में देख बागी उम्मीदवार व उनके समर्थक बड़े खुश हुए। कांग्रेस के बागियों में ऐसे नाममात्र भी नहीं, जो संकट पैदा कर सकें। इसलिए अधिकांश स्थानों पर इस परिश्रम के पसीने से भगवा कुर्ते ही भीगे हैं। पर्चा भरने के अंतिम दिन हमने विस्तार से बागियों के बारे में बात की थी। वह किस्सा अब खत्म हुआ। और उभरे नए, मजेदार किसिम-किसिम के किस्से। जैसे:

सेठां री गिद्दी, ठरको चाकर रो
जयदीप बिहाणी श्रीगंगानगर सीट से कांग्रेस के बागी थे। वे एसडी शिक्षण संस्थान के मालिक हैं। उनके अकाउंटेंट राजकुमार गौड़ ने भी कांग्रेस टिकट मांगा था। मिल गया। नाराज मालिक बागी खड़े हो गए। कांग्रेस महासचिव मुकुल वासनिक ने फोन कर उन पर दबाव बनाया। अब वे अपने अकाउंटेंट का प्रचार करते पाए जाएंगे।

कांग्रेस री गोळी, भाजपा रो पेटदर्द
अलवर जिले की किशनगढ़बास सीट पर कांग्रेस के बागी भरत यादव अब समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार हैं। उनके विद्रोह से कांग्रेस को खास फर्क नहीं पड़ रहा लेकिन भाजपा के रामहेत यादव खासे परेशान हैं। क्योंकि क्षेत्र में 45 हजार यादव वोट हैं जो अब बंट जाएंगे। पूर्व मंत्री जगमाल यादव के बेटे होने का फायदा भी बागी कांग्रेसी को मिलेगा, सो अलग।

हार्यां नैं हार, जीत्यां नैं मार
सांचौर के भाजपा बागी जीवाराम का दर्द सबसे जुदा है। वे हारे थे तो पार्टी ने टिकट से नवाजा। 45 हजार वोटों से रिकॉर्ड जीत दर्ज की तो टिकट काट दिया। नाम वापसी के अंतिम दिन भाजपा के अंतिम प्रयासों को विफल कर वे मैदान में डटे हैं।

गळबंदी बाजै
धौलपुर में दृश्य अलग ही है। कांग्रेस विधायक बनवारीलाल शर्मा के क्षेत्र का काम उनके छोटे भाई की पत्नी मिथलेश संभालती थीं। इस बार बनवारी पुत्र अशोक शर्मा प्रत्याशी बनाए गए। नाराज चाची- जो सरपंच तो कांग्रेस की हैं- अब भतीजे के विरुद्ध सपा से लड़ रही हैं।

गंगा रो घाट, जमना रो नीर
जोधपुर से खबर आई है कि फलौदी सीट से बागी भाजपाई प्रकाश छंगाणी ने नाम वापस ले लिया। लेकिन भाजपा कार्यकर्ताओं का आकलन रोचक है- उनका मानना है कि कांग्रेस का प्रत्याशी ब्राrाण है- इसलिए छंगाणी के हटने का फायदा भी कांग्रेस को मिलेगा, हमें नहीं। वे पार्टी नहीं, समाज के दबाव में हटे हैं। बागी किसी भी दल के हों, उनकी चुनौती वोट काटना है- जबकि उनका लक्ष्य चुनाव जीतना होना चाहिए। आखिर जिंदा कौम पांच साल इंतजार क्यों करेगी?





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