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अजमेर. पुष्कर मेले में आए घोड़ों में घोषित रूप से 47 बीमार अश्वों ने छूत की बीमारी ‘इक्वाइन इन्फ्लुएंजा’ को देश भर में पहुंचा दिया है। बीमारी यूपी के घोड़ों के साथ आई थी। अलवर के एक अश्वपालक की घोड़ी मर भी गई। हालांकि पशुपालन विभाग उसकी मौत के लिए आंतों के सीवियर इन्फेक्शन को जिम्मेदार बता रहा है।
राज्य सरकार ने 5 और 7 नवंबर को जारी आदेशों में सभी संबंधित विभागों से यूपी से घोड़ों के साथ आए इक्वाइन इन्फ्लुएंजा रोग नियंत्रण के मद्देनजर मेला ग्राउंड पर वैक्सीन की पर्याप्त मात्रा सुनिश्चित करने को कहा था। स्वस्थ और बीमार घोड़ों को अलग अलग रखने, बीमार घोड़ों के सैंपल लेने और इलाज के अलावा उसके फॉलोअप पर भी बराबर जोर दिया था। इसके बावजूद वैक्सीन तो उपलब्ध था ही नहीं और बीमार अश्व भी स्वस्थ घोड़ों के बीच से नहीं हटाए गए।
नतीजतन इससे बीमारी न सिर्फ मेले में, बल्कि राज्य और देश में आम हो गई। मेले में इस बार कुल 3044 घोड़े आए, इनमें से 519 घोड़े दूसरे राज्यों से आए थे। कुल 1285 अश्वों का क्रय-विक्रय किया गया। इनमें से 189 अश्व दूसरे राज्यों में गए हैं। मेले के दौरान 2465 का स्वास्थ्य परीक्षण किया गया, जिनमें से 47 घोड़े बीमार पाए गए।
बीमारी और बचाव
इक्वाइन इन्फ्लुएंजा मुख्य रूप से सर्दीजनित एक वायरल रोग है जो शत-प्रतिशत संक्रामक है। पशु के नाक से लगातार पानी गिरता है। अश्व 104-105 डिग्री बुखार के साथ निढाल हो जाता है। पशुपालन विभाग के अनुसार इससे मौत की संभावना नहीं है।
बीमार घोड़ों को दूसरे चौपायों से अलग रखा जाए। बीमार घोड़ों के संपर्कमें रहने वाले अश्वपालक दस्तानों का प्रयोग करें। अलवर के प्रतापसिंह की एक घोड़ी मरी है। उसे इक्वाइन इन्फ्लुएंजा की बजाय सिवियर इन्टेस्टाइन इन्फेक्शन था। कुल 157 सैंपल लिए गए हैं। इन सभी की रिपोर्ट राजस्थान रोग निदान केंद्र, जयपुर से अभी आनी है। यह सही है कि बीमार घोड़े देशभर में गए हैं।
-डॉ. रामप्रकाश, संयुक्त निदेशक पशुपालन विभाग
मेरा भी एक घोड़ा मेले में बीमार था, जिसका इलाज अपने स्तर पर कराया गया। अरबों की कीमत के मवेशी मेले में मौजूद थे लेकिन जरूरी वैक्सीन मेले में मौजूद नहीं था। हिसार में भी पता किया, वहां आज भी नहीं है।
-नारायण सिंह माणकलाव, जोधपुर, राज्यसभा सदस्य
अधिकारियों को इससे लेना देना नहीं था कि बीमारी देश भर में फैल जाएगी। उनका मतलब तो शो जारी रहने से था। स्पर्धा में जांच के लिए विशेषज्ञ एक घोड़े के मुंह में हाथ डाल रहे थे, फिर वही बिना धुला, बिना ग्लव्ज वाला हाथ दूसरे घोड़े के मुंह में डाल रहे थे। वे खुद घातक बीमारी प्रतिभागी घोड़ों में फैला रहे थे।
- फै्रसिस्का केली, अश्वपालक, यूनाइटेड स्टेट्स
मैंने जब मेले में इक्वाइन इन्फ्लुएंजा की बात की तो मेरी भारतीय अश्व संस्था को ही फर्जी बता दिया गया। तब यह कहा गया कि कोई बीमारी ही नहीं है। अश्वपालक इस बीमारी से घबराए थे और अधिकारी लीपापोती में लगे थे।
- राघवेंद्रसिंह डूंडलोद, अश्वपालक, जयपुर