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इंदौर. मालवा-निमाड़ के साथ ही प्रदेश की राजनीति में खासा वर्चस्व रखने वाले दोनों प्रमुख दलों के चार दिग्गज नेता इस बार अपने क्षेत्रों तक ही सीमित होकर रह गए हैं। इनमें से तीन सुभाष यादव, जमुनादेवी और कैलाश विजयवर्गीय तो खुद चुनाव लड़ रहे हैं जबकि विक्रम वर्मा पत्नी नीना के मैदान में होने से क्षेत्र से ही नहीं निकल पा रहे हैं।
माफ करना, मैं आपके यहां नहीं आ सकूंगा
सुभाष यादव
खरगोन के साथ ही खंडवा, बुरहानपुर, बड़वानी व धार जिले की राजनीति में भी खासा दखल रखते हैं। 30-32 सीटों पर उनके प्रभाव का पार्टी हमेशा उपयोग करती रही है। उन्होंने सहकारी क्षेत्र में 20 साल में जो नेटवर्क बनाया वह भी कांग्रेस के लिए हर चुनाव में मददगार साबित होता है। इस बार भी सात समर्थकों को टिकट दिलाने में कामयाब रहे और सभी चाहते हैं कि श्री यादव उनके क्षेत्र में प्रचार के लिए समय निकालें पर वे कोई जोखिम न उठाते हुए अपने क्षेत्र में ही पूरा समय दे रहे हैं।
जमुनादेवी
आदिवासी क्षेत्रों में अच्छा वर्चस्व तथा अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ रहे इंदौर व उज्जैन संभाग के कई उम्मीदवारों को प्रचार के लिए इनकी दरकार है। नजदीक के गंधवानी क्षेत्र से उम्मीदवार भतीजे उमंग सिंगार के प्रचार के लिए भी नहीं जा पा रही हैं। प्रदेश चुनाव समिति और स्क्रीनिंग कमेटी की सदस्य होने का फायदा लेकर कुछ सीटों पर समर्थकों को टिकट दिलाने में कामयाब रहीं पर अब मदद नहीं कर पा रही हैं।
विक्रम वर्मा
कुशल वक्ता। धार से कई बार चुनाव जीत चुके। हर चुनाव में प्रदेश में भाजपा के लिए स्टार प्रचारक की भूमिका में रहते थे लेकिन इस बार धार से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं क्योंकि पत्नी चुनाव लड़ रही है इसलिए उन्हीं की प्रतिष्ठा ही दांव पर लगी हुई है। श्री वर्मा को जहां कांग्रेस की चुनौती है वहीं उन्हें अपनों को भी साधना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में वे कोई जोखिम उठाना नहीं चाहते, इसलिए प्रदेश भाजपा ने उनका दौरा कार्यक्रम बनाया पर वे कहीं नहीं जा रहे हैं।
कैलाश विजयवर्गीय अच्छे वक्ता, भीड़ को बांधने की ताकत व चुनाव प्रबंधन के विशेषज्ञ। मालवा-निमाड़ की करीब 50 सीटों पर प्रभाव रखने के साथ ही प्रदेश के दूसरे अंचलों में भी खासा वर्चस्व। कई उम्मीदवार अपने क्षेत्र में प्रचार के लिए बुला रहे हैं पर महू में कांग्रेस के अंतरसिंह दरबार से कड़े मुकाबले में उलझे हैं। नया क्षेत्र होने से कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते जबकि प्रदेश भाजपा की योजना इंदौर व उज्जैन संभाग की कई सीटों पर उनका उपयोग करने की थी।