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जीना है तो सिर उठा के जियो

विकास मंत्र. मनुष्य जीवन में कुछ कष्ट इतने घातक होते हैं कि अग्नि न होते हुए भी वे मनुष्य को जलाकर राख कर देते हैं। स्त्री से वियोग, अपने सगे-संबंधियों द्वारा किया गया अपमान, कर्जदार होना, दरिद्रता और मनुष्य के विरुद्ध किसी सभा का आयोजन उसे तिल-तिल जलने पर मजबूर कर देता है।

स्त्री से बिछोह या वियोग अर्थात पत्नी से अलग होने पर मनुष्य भरी-पूरी दुनिया में स्वयं को अकेला अनुभव करता है। संतान भी अपने-अपने परिवार में व्यस्त हो जाती है। एक पत्नी ही वृद्धावस्था तक सुख और दु:ख की साथी होती है। यदि वह साथ छोड़ जाए तो मनुष्य उसके वियोग में तिल-तिलकर जलता रहता है।

सगे-संबंधियों द्वारा अपमानित होने पर भी मनुष्य सर्वाधिक पीड़ा का अनुभव करता है, क्योंकि अपनों से उसे प्रेम एवं सम्मान की स्वाभाविक आशा होती है। अपनों से अपमान की पीड़ा भी मनुष्य को दिन-रात जलाती है।

कर्जदार होना भी किसी ज्वाला से कम नहीं है। कर्जदार को कर्ज न चुकाने पर बारंबार अपमानित होना पड़ता है और प्रतिभासंपन्न होने पर भी उसे किसी निम्न श्रेणी के व्यक्ति की भांति सिर झुकाकर रहना पड़ता है।

दरिद्रता का जीवन भी किसी जलन से कम नहीं है। धन के अभाव में दरिद्र व्यक्ति पशु की भांति पेट भरने के लिए यहां-वहां भटकता रहता है। मनुष्य की भांति वह कभी गर्व से अपना सिर नहीं उठा पाता।

समाज में मनुष्य का आदर-सत्कार ही सर्वोपरि होता है। चाहे घर में पर्याप्त सुख-सुविधाएं न हों, पर समाज से प्राप्त आदर-सत्कार मनुष्य को ऊंचा उठा देता है। परंतु यदि समाज द्वारा ही मनुष्य के विरुद्ध किसी सभा का आयोजन किया जाए, समाज द्वारा उसे अपमानित किया जाए या खरी-खोटी सुनाई जाए, तो यह पीड़ा अग्नि की भट्टी में जलने, झुलसने के समान होती है।





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