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गांवों में की गई सेवा ही ईश्वर की सच्ची सेवा

जन्मदिन पर विशेष. birthday प्राचीनकाल से ही भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता का निर्माण ग्रामीण समुदाय की नींव पर हुआ है। आज भी भारतीय संस्कृति प्रमुख रूप से गांवों में ही जीवित बची है। राष्ट्र का जीवन गांवों द्वारा ही पोषित हो रहा है।

गांवों की उन्नति को अनदेखी करना या उन्हें पतन की ओर जाने देना एक भूल है। ‘यदि गांव की उन्नति होती है तो नगर तथा राज्य भी विकसित होगा। इससे संपूर्ण राष्ट्र उन्नति के शिखर पहुंचेगा। राष्ट्र की उन्नति गांवों के विकास पर आधारित है। सभी लोगों में गांव के कल्याण की हृदय से इच्छा होना चाहिए।’ यह कहना है सत्यसांई बाबा का।

वे कहते हैं मैं तुम्हें इस बात की जानकारी देने आया हूं कि तुम स्वयं आनंद हो। आनंद तो तुम्हारे स्वयं का घर है, जहां से तुम भटक गए हो। यही तुम्हारा अपना निवास है। इसे जान लो कि आनंद तुम्हारी प्रकृति है। तुम्हारा पोषक तत्व है तथा यही तुम्हारा लक्ष्य है। गांव ही ऐसे स्थान हैं, जहां यह ज्ञान सरलता से लोगों में घर कर जाता है तथा उनमें अधिक गहराई से गले उतरता है। यही कारण है कि मुझे गांव अधिक प्रिय हैं। इस ज्ञान को प्राप्त करने की कुछ अपनी अनिवार्य आवश्यकताएं हैं। जैसे निर्लिप्तता का गुण, स्पष्टवादिता, ईमानदारी और लगनशीलता। ये गुण धुंधले रूप में क्यों न हों, सिर्फ गांवों में ही जीवित हैं। ये गुण तो लंबे समय पूर्व ही शहरों से पलायन कर चुके हैं। यह जरूर है कि तुम्हारी अपनी कठिनाइयां और बाधाएं हैं, फिर भी यदि तुम एक स्वच्छ जीवन जीने तथा अपने अंदर के दिव्यत्व को जगाने का निश्चय कर लेते हो तो तुम्हारे मार्ग में अपेक्षाकृत कम बाधाएं हैं।

बाबा कहते हैं कि ग्राम सेवा राम की सेवा है। गांवों में की गई सेवा ईश्वर के प्रति की गई सेवा है। राम के प्रति की गई तुम्हारी पूजा अर्थहीन है, यदि तुम अपने ग्राम की भलीभांति सेवा नहीं करते। यदि अपने हृदय में श्रीराम को स्थापित नहीं किया तो राम के मंदिर के निर्माण से क्या लाभ है? अपने हृदय को पवित्र करो तथा गांव को ही ईश्वर आराधना का हृदय मंदिर बनाओ। जब तुम अपने गांव की सेवा को ही श्रीराम की सेवा बना लोगे तो इससे तुम्हारे आर्थिक, सामाजिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक कल्याण में वृद्धि होगी।

ग्राम सेवा द्वारा ही जीवन के लक्ष्य अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति सुनिश्चित हो जाएगी। इस सत्य को तुम अपने मन में धारण कर लो तथा इसे दैनिक व्यवहार में अपना लो। तुम सभी के लिए यही मेरा संदेश है। मैं तुम सभी के आनंद, शांति व समृद्धि की अभिलाषा करता हूं।

यह एक वास्तविकता है कि भारतीय संस्कृति सार्वभौमिक संस्कृति है जो कि संपूर्ण मानवता का प्रतिनिधित्व करती है। हमारी संस्कृति विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक संस्कृति है- हृदय की संस्कृति है। इसका पतन संपूर्ण मानवता के लिए एक अभिशाप है। हमारी परंपरागत विरासत के पतन का, ग्रामों के सतत् गिरावट होने से प्रत्यक्ष संबंध रहा है तथा इसी प्रकार भारतीय संस्कृति के गिरावट का संबंध सार्वभौमिक संस्कृति के साथ जुड़ा है।

नि:स्वार्थ सेवा करना, इस संसार सागर को पार करने का सवरेत्तम साधन है। वेद यह उद्घोषणा करते हैं- ‘न तप से न पवित्र तीर्थस्थल की यात्रा से, लेकिन मानवता की सेवा द्वारा ही मोक्ष पाया जा सकता है सेवाभाव से अहंकार मिट सकता है। इस प्रकार यह आध्यात्मिक उन्नति से संयुक्त है।’ यद्यपि आध्यात्मिक संपदा, सरस्वती नदी की भांति अंत:प्रवाह बह रही है, हमारी प्राचीन विरासत को पुन: स्थापित करने हेतु कठोर, इच्छाशक्ति तथा ईश्वरीय अनुग्रह अत्यावश्यक है। इच्छाशक्ति के शुद्धिकरण के बिना आध्यात्मिकता असंभव है। इसके लिए विचारों में सत्यता, इच्छाओं की पवित्रता तथा सदाचार की उत्कंठा आवश्यक है। हमारी आध्यात्मिक संस्कृति ने शांति और सामंजस्य का संदेश विश्व के अन्य राष्ट्रों को पहुंचाया। तब व आज भी आर्य परंपरा संपूर्ण विश्व के कल्याण की घोषणा करती है। लोका: समस्ता: सुखिनो भवन्तु (संपूर्ण विश्व का कल्याण हो)।

ग्राम सेवा का ही एक उत्कृष्ट उदाहरण है श्री सत्यसांई केंद्रीय न्यास की श्री सत्यसांई जलापूर्ति योजना। 21 नवंबर 1996 को अनंतपुर जिले में शुरू हुई पेयजल योजना से 761 गांवों को शुद्ध पेयजल दिया जा सका। इससे 20,000 वर्ग कि.मी. क्षेत्रफल लाभान्वित हुआ। इसमें 2500 कि.मी. पाइप लाइन 200 पंप 250 बोरवेल , 268 ओवरहेड टैंक्स, 124 रिजरवायर, 50 जनरेटर तथा 100 एकड़ भूमि में फैले समर स्टोरेज टैंक्स शामिल हैं।

इस योजना के क्रियान्वयन से सुदूर ग्रामों में जहां लोग पेयजल जैसी मौलिक आवश्यकता से वंचित थे, इसका लाभ ले सके। ग्राम सेवा ही राम की सेवा का ऐसा उदाहरण विरला ही है। इस अवसर पर हम भगवान श्री सत्यसांई बाबा के प्रति कृतज्ञ जिन्होंने हमें मानव सेवा ही माधव सेवा है जैसे दिव्य संदेश देकर मानवता को कृतार्थ किया है।
(लेखक इंदौर विकास प्राधिकरण में सहायक यंत्री हैं।)





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