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दृष्टिकोण.
भारत में जिन लोगों की पूजा होती है, उनमें फिल्मी सितारे पहले नंबर पर हैं। इनमें अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान का नंबर सबसे ऊपर है और थोड़े कम पूजे जाने वाली हस्तियों की तो भरमार है। अगरबत्ती आदि जलाकर इनकी पूजा करने वाले करोड़ों प्रशंसक इन पर जान लुटाते हैं। फिल्म स्टारों के बाद नंबर आता है क्रिकेटरों का। इनमें सचिन तेंडुलकर, सौरव गांगुली, महेंद्रसिंह धोनी, हरभजन सिंह, वीरेंद्र सहवाग, युवराज सिंह, जहीर खान और इरफान जैसे खिलाड़ी हर जगह पहचाने और सराहे जाते हैं।
शोहरत के मामले में ये किसी से पीछे नहीं, पर धन के मामले में फिल्म स्टार्स इनसे आगे हैं। टेस्ट क्रिकेट से अनिल कुंबले और फिर सौरव गांगुली के रिटायरमेंट ने प्रशंसकों को खूब रुलाया। अन्य खेलों के मामले में ऐसा नहीं है। टेनिस में लिएंडर पेस, महेश भूपति और खूबसूरत सानिया मिर्जा ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है, लेकिन उतना हासिल नहीं किया जितना क्रिकेटरों को मिला है। हॉकी, टेनिस, फुटबॉल, कुश्ती और बॉक्सिंग के खिलाड़ी आमतौर पर उपेक्षित रहते हैं।
देश में करोड़ों लोगों द्वारा पूजे जाने वाला तीसरा वर्ग धर्म गुरुओं, साधु-साध्वियों का है, जो मानते हैं कि उन्हें पूजा जाना चाहिए। आसाराम बापू, मुरारी बापू, मां अमृतामयी और कृपालु जी महाराज आदि के देश-विदेश में बड़ी संख्या में अनुयायी हैं। धार्मिक मामलों से थोड़ा दूर रहने के कारण मैं यह सब पसंद तो नहीं करता, लेकिन जानता हूं कि कई धार्मिक संस्थान बिना किसी जातिगत भेदभाव के अस्पताल और स्कूल चलाते हैं, जो एक अच्छी बात है।
काम-धंधे में भी स्थिति एक समान नहीं है। कई काम ऐसे हैं जिन्हें खूब सराहा जाता है, लेकिन ऐसे कामों की भी कमी नहीं जिन्हें ज्यादा इज्जत नहीं मिलती। जिस काम को हिकारत से देखा जाने लगा है, उसमें पहला नंबर नेतागिरी का है। नेताओं के साथ हम कुछ ज्यादा सख्ती से पेश आते हैं। सबसे पहले हम उन्हें नेता बनाते हैं, फिर उनके पीछे-पीछे भागते हैं और फिर उन्हें गैर-भरोसेमंद करार देकर जमीन पर ले आते हैं। ऐसा करना नहीं चाहिए, लेकिन हम करते हैं।
इसके बाद नंबर आता है वकीलों का। इनके मामले में भी हमारा रवैया सख्त है। पहले हम इनकी सेवाएं हासिल करते हैं और बाद में कोसते हैं। वकीलों के बाद जिस वर्ग को ज्यादा पसंद नहीं किया जाता, वह पुलिस वाले हैं। एक हाथ में इस दुनिया का कानून और दूसरे हाथ में डंडा पकड़ने वाले पुलिसकर्मियों का काम बेहद चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन हमारे देश में पुलिस खासकर जूनियर पुलिसकर्मियों की छवि सबसे भ्रष्ट वर्ग के रूप में होती है।
ऐसा इसलिए है क्योंकि कई पुलिसकर्मी कानून और डंडे का डर दिखाकर वसूली करते हैं। भ्रष्ट और नापसंद ही सही, लेकिन पुलिस के बिना हमारा काम भी तो नहीं चलता। खासकर तब जबकि हमारे देश में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जो स्वयं को कानून से ऊ पर समझते हैं। कानून और व्यवस्था की परवाह न करने वाले ये लोग खुलेआम पुलिस को उन्हें गिरफ्तार करने की चुनौती देते हैं। समय आ गया है कि पुलिस हरकत में आकर ऐसे लोगों को सबक सिखाए। पुलिस ऐसा कर लेती है तो हो सकता है कि लोगों के मन में उसकी छवि भी अच्छी हो जाए और लोग उसे भी पूजने लगें।
भाषा का कमाल
इन दिनों लंदन में अपने डॉक्टर पति और दो बच्चों के साथ रह रहीं मोनी मोहसिन मूलत: पाकिस्तान के लाहौर की रहने वाली हैं। कुछ माह पहले मैंने इनका नॉवेल ‘द एंड ऑफ इनोसेंस’ (पैंगुइन-वाइकिंग प्रकाशन) पढ़ा। तब मैं यह नहीं जानता था कि वह अपने जीजा नजम सेठी के लाहौर से प्रकाशित होने वाले ‘फ्राइडे टाइम्स’ में कॉलम भी लिखती हैं। ‘द डायरी आफ ए सोशल बटरफ्लाई’ (रैंडम हाउस) शीर्षक के अंतर्गत मोहसिन के चुनिंदा लेखों का प्रकाशन अब भारत में भी हुआ है। अपने पति, जिसे वह प्यार से जानू कहती हैं तथा परिवार के अन्य सदस्यों के जरिए वह अंग्रेजी और उर्दू की मिली-जुली खिचड़ी भाषा का प्रयोग कर सामाजिक मुद्दों पर बड़ी रोचक और पठनीय टिप्पणी करती हैं। उनका लेखन पढ़ने के दौरान आप हंसे बगैर नहीं रह सकते।
यहां मैं कुछ उदाहरण दूंगा। वह लिखती हैं, ‘जिंदगी बदल गई है। पार्टियां खत्म हो गई हैं। अब न तो क्रि केट बचा है और न मैच हो रहे हैं। अब करने के लिए कुछ है नहीं और जाने के लिए कोई जगह नहीं मिल रही, लेकिन मैं अपने पड़ोसियों यानी भारतीयों के बड़े-बड़े जहाजों से प्रभावित हूं। दाल-सब्जी खाकर, माथे के बीचो-बीच सिंदूर लगाकर और एक बढ़िया-सी साड़ी पहनकर अब मैंने भी भारतीय होने का फैसला कर लिया है। रंग गोरा न होने के कारण मैं एक फेयरनेस क्रीम भी तलाश रही हूं। कुल मिलाकर मेरा अभियान पूरी तरह सरहद पार रहने वाले दोस्तों की तरह बनने और दिखने का है। मैंने बोलना भी उन्हीं की तरह शुरू कर दिया है। जब लोग मुझे पूछते हैं कि मैं ऐसा क्यों कर रही हूं तो मैं कहती हूं ‘मैं ऐसी ही हूं।’
एक उदाहरण उनकी नौकरानी द्वारा फोन अटैंड करने का है। एक दिन जब वह बाथरूम में थीं, तभी फोन की घंटी बजी। नौकरानी ने फोन उठाया तो उधर से मुल्लू ने पूछा, बेगम साहिब क्या कर रही हैं? नौकरानी ने जवाब दिया- वो पॉट पर बैठकर सु-सु कर रही हैं। बाथरूम में जब मेरे कानों में ये शब्द पड़े तो मैं मिसाइल की तरह बाहर आई और नौकरानी की बाजू पकड़कर बोली, तुम्हें कितनी बार कहा है कि जब कोई फोन आए और मैं बाथरूम में होउं तो तुम्हें कहना है कि बेगम साहिब नहा रही हैं।
नौकरानी ने हैरानी से कहा, लेकिन आप तो सु-सु कर रही थीं। मैंने धमकाते हुए कहा, मैं कभी भी पॉट पर सु-सु या कुछ और नहीं करती। जब भी बाथरूम जाती हूं, नहाने या हाथ धोने के लिए ही जाती हूं। हां, साहब की मां का फोन आने पर तुम कह सकती हो कि मैडम नमाज के लिए वुजु कर रही हैं।’
इंडियन पैसा लीग
क्रिकेट की दुनिया में आईपीएल ने जन्म लिया गरीब गेंदबाजों की बल्लेबाजों के हाथों धुनाई के लिए। ललित मोदी ने प्रिटी जिंटा, शाहरुख खान, अंबानी और माल्या से हाथ मिलाया और इन्होंने खूब माल लगाया।
मैच दिखाकर सैट मैक्स की टीआरपी मैक्सिमम हुई। चारु को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और विदेशी खिलाड़ियों ने काफी जोर दिखाया। यह दरअसल इंडियन पैसा लीग थी और क्रि केट के गुरु ओं की जन्नत। कइयों के लिए थी यह बिकनी क्रिकेट, पर माल बनाने वाले रहे बेफिक्र। (जनकपुरी, दिल्ली के पार्थ अधिकारी के सौजन्य से)
-लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।