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मंदी के बीच वेतन वृद्धि

संपादकीय. विधानसभा चुनाव और वैश्विक आर्थिक मंदी के बीच भारत सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों के कर्मचारियों के वेतन में पचास फीसदी से तीन सौ फीसदी तक की बढ़ोतरी को अंतत: केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी मिल गई।

इस फैसले का लाभ सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के लगभग सोलह लाख कर्मचारियों को होगा। इस वेतन वृद्धि के लिए कंपनियों को ए, बी, सी और डी श्रेणियों में बांटा गया था। मोटे मुनाफे में चलने वाली कंपनियों को ए श्रेणी में रखा गया था और घाटे वाली इकाइयों को डी में। मुनाफे में चल रही कंपनियों में पहली जनवरी 2007 से यह वेतन वृद्धि समान रूप से लागू होगी, जबकि घाटे में चलने वाली इकाइयों के लिए उनकी वित्तीय स्थिति के हिसाब से निर्णय लिया जाएगा।

अब नए वेतनमान के हिसाब से ए श्रेणी की सार्वजनिक इकाई के चेयरमैन का वेतन 80 हजार से एक लाख पच्चीस हजार रुपए के बीच होगा। कुछ समय पहले ही केंद्र सरकार के कर्मचारियों के वेतन में छठे आयोग की सिफारिशों के बाद भारी वृद्धि की गई थी, जिसके बाद लगातार यह मांग बढ़ती जा रही थी कि अन्य क्षेत्रों में भी तनख्वाहें बढ़ाई जाएं। हालांकि न्यायिक सेवा के अधिकारियों और जजों के वेतन बढ़ाने की मांग पर अभी तक फैसला नहीं हो सका है और उम्मीद की जा रही है कि उस पर मंत्रिमंडल जल्द ही विचार करेगा।

केंद्रीय मंत्रिमंडल के इस फैसले के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों पर तकरीबन नौ हजार करोड़ रुपए का बोझ बढ़ेगा और उनका वेतन बिल बाइस हजार करोड़ तक पहुंच जाएगा। पिछले कई सालों से विभिन्न सरकारी उपक्रमों के अधिकारी निजी क्षेत्रों में जाते रहे हैं।

सरकारी उपक्रम के चेयरमैन को जहां 18,500-30,000 रुपए वेतन मिलता है, वहीं निजी क्षेत्र में कोई भी सलाहकार एक बैठक के एक लाख रुपए ले लेता है। खासतौर से सेल और ओएनजीसी और पेट्रोलियम कंपनियों के प्रमुखों का वेतन बढ़ाकर 1-1.25 लाख रुपए प्रतिमाह तक किया गया है। निजी कंपनियों की तुलना में सरकारी उपक्रमों की नौकरियों को आकर्षक बनाना इसलिए जरूरी हो गया है कि दुनिया की कई बड़ी तेल और स्टील कंपनियां भारत में अपनी गतिविधियां बढ़ा रही हैं।

मगर केंद्रीय मंत्रिमंडल के इस फैसले के बाद विसंगति यह पैदा हो रही है कि इसका लाभ 66 केंद्रीय उपक्रमों के कर्मचारियों को नहीं मिल पाएगा, क्योंकि यह नया पैकेज प्राप्त करने के लिए उन्हें लगातार तीन साल तक मुनाफा कमाना होगा। सरकारी उपक्रमों के कर्मियों को जो बड़ी रकम मिलने वाली है, उससे उपभोक्ता वस्तुओं, वाहन उद्योग और आवास क्षेत्र में मांग पैदा होने की संभावना है, जिन पर मंदी का असर दिख रहा है। पिछले सप्ताहों से मुद्रास्फीति की दर कम हो रही है, लेकिन उसका फायदा आम लोगों को कितना मिल पाएगा, अभी यह कह पाना जल्दबाजी होगी।





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