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राजनीति की आन, महल की शान दांव पर

बीकानेर. ele जूनागढ़ में ‘प्राचीना’ संग्रहालय संचालित करने वाली पूर्व राजकुमारी सिद्धि कुमारी राजनीति में आई भी हैं तो दुष्यंतसिंह की सलाह पर। इसी वजह से यह सीट मुख्यमंत्री की प्रतिष्ठा से जुड़ गई है।

उनका मुकाबला कांग्रेस के डॉ. तनवीर मालावत से तो है ही पर्यटन एवं आबकारी मंत्री देवीसिंह भाटी समर्थक पाषर्द विश्वजीतसिंह को जितने भी वोट मिलेंगे उसका असर भाजपा पर ही अधिक पड़ेगा। भाजपा से बागी हुए गहलोत ने मान- मनौवल के बाद सिद्धि कुमारी के पक्ष में नाम वापस ले लिया हो लेकिन माली समाज के मन में फांस गड़ गई है कि समाज को अवसर नहीं दिया गया।

त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति
शहरी मतदाता बहुल नई सीट बीकानेर पूर्व विधानसभा क्षेत्र में अब त्रिकोणीय संघर्ष की ही स्थिति है। जहां तक छवि का सवाल है तो तीनों की ही छवि बेहतर है। पूर्व राजकुमारी सिद्धि शिक्षित हैं। सौम्य छवि होने के साथ ही राजघराने की पहचान होने से सभी वर्गो के मतदाताओं में उनका आकर्षण भी बढ़ गया है। उधर, क्षेत्र में तीनों ही प्रत्याशियों के बीच त्रिकोणीय मुकाबले को लेकर चुनावी माहौल गर्माया हुआ है।

बुद्धिजीवियों में खास पहचान
कांग्रेस प्रत्याशी डॉ. तनवीर मालावत पेशे से चिकित्सक (सर्जन) और रंगकर्म में भी सक्रिय हैं। क्षेत्र के मरीजों और उनके परिवारों में उनकी छवि मददगार चिकित्सक की है। बुद्धिजीवी-शिक्षित वर्ग में भी समर्पित रंगकर्मी के होने से वे परिचय के मोहताज नहीं हैं। इसी के साथ लगातार 23 घंटे लेप्रोस्कॉपिक सर्जरी करके डा. तनवीर ने लिम्का बुक में नाम दर्ज कराकर बीकानेर को पृथक से पहचान दिलाई है। वे खुद अल्पसंख्यक समाज से हैं।

बहादुरी का किस्सा लोगों में चर्चित
प्रदेश की राजनीति में बड़ा उलटफेर करने की ताकत रखने वाले देवीसिंह भाटी के दाएं हाथ समझे जाने वाले विश्वजीत सिंह हरासर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में है। वे नगर पालिका चुनाव में सर्वाधिक मतों से पार्षद का चुनाव जीत चुके हैं। बीकानेर आयुद्ध डिपो में लगी भीषण आग के दौरान जिस तरह जान पर खेलकर विश्वजीत सिंह ने हथियारों से लदे ट्रकों को लपटों के बीच से सुरक्षित निकाला और सैकड़ों परिवारों को जानमाल की राहत दिलाई। वो किस्से यहां के लोग राजपूतों के दुर्धर्ष संग्राम की गाथा के रूप में सुनाते हैं।

गणित गड़बड़ाया!
भारतीय जनता पार्टी खेमे के लिए यह राहत की बात हो सकती है कि गोपाल गहलोत ने अंतिम समय नाम वापस ले लिया। किंतु यह भी हकीकत है कि लंबे अरसे तक शहर भाजपा अध्यक्ष रहे गोपाल गहलोत को पार्टी यहां से प्रत्याशी घोषित करेगी ऐसा माली समाज सहित स्थानीय भाजपा का बड़ा वर्ग भी मान रहा था।

मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ओम माथुर, आरएसएस के प्रदेश महामंत्री प्रकाश चंद्र आदि के संयुक्त दबाव से गहलोत भले ही मान गए हों लेकिन गहलोत का कहना माली समाज के लोग भी मानेंगे यह कोई नहीं मानता। इसका असर पार्टी के प्रत्याशी को भुगतना पड़ सकता है। कुल मिलाकर यह चुनाव रोचक इसलिए बन गया है कि यहां भाजपा और कांग्रेस के अलावा निर्दलीय की गणित भी चुनावी नतीजे को प्रभावित कर रही है।





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