|
विशेष. पती दोपहरी में प्रचार के दौरान नारों-जयकारों के बीच भीड़ को चीरती एक बुलंद आवाज से वातावरण में हैरानगी। आवाज एक बुजुर्ग महिला की। सामने प्रत्याशी। प्रश्न ही प्रश्न। तीखे, नश्तर से चुभते प्रश्न। प्रत्याशी परेशान। 70-72 साल की नारायणी हाथ नचा-नचा कर कभी दुखी होते हुए तो कभी गुस्सा होते हुए बोलती। उसके प्रश्न, प्रत्याशी की आंखों के सामने अंधेरा सा फैला देते। कोई उत्तर नहीं। बस थे तो नारायणी के प्रश्न।
नारायणी, जयपुर के किशनपोल विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं समझी जानी चाहिए। उसने प्रश्न तो शुक्रवार को उठाए- किंतु ऐसे ही प्रश्न- न जाने कितनी संख्या में मतदान के दिन 4 दिसंबर तक उठते रहेंगे। ये प्रश्न इस नारायणी ने तो भाजपा प्रत्याशी मोहन गुप्ता से किए थे- किंतु अभी लाखों नारायणियां 200 सीटों के लिए सत्ता-संघर्ष में जुटे 2000 से अधिक मोहनों- मोहिनियों से ऐसे ही प्रश्न करेंगी। जैसे नारायणी ने किए : ‘हर घड़ी बिजली के तारों का डर रेवै है, क्यूं? पानी नहीं आवै, क्यूं? जदै जरूरत हो तब तो को नी सुणीं..’ कांई खेता.. नारायणी के सवालों के सामने उम्मीदवार ने हाथ जोड़े और ‘माताजी, आराम से..सब करेंगे’ कह कर आगे बढ़ गए।
बस यही हम मतदाताओं की नियति है। या यूं कहें कि बना दी गई है। हमने इसी स्तंभ में ‘जो जीत की जाति, वही हार का मुद्दा’ के अंतर्गत 8 नवंबर को चर्चा की शुरुआत ही इस बात से की थी कि इस चुनाव में मुद्दे बहुत हैं। मुद्दे ही मुद्दे हैं। भाजपा को बचाव करना पड़ रहा है। कांग्रेस को सफाई देनी पड़ रही है।
और किस तरह लोग, समूह व समाज प्रश्नों के साथ तैयार हैं, इसकी विस्तार से बात 19 नवंबर को ‘उम्मीदवार हमारे घर क्यों नहीं आते’ में उठाई गईं थीं। नारायणी इन्हीं प्रश्नों का प्रतिनिधि चेहरा है। और लोकतंत्र की पीड़ा ही यह है कि हर प्रत्याशी ‘माताजी, आराम से सब करेंगे’ कहकर आगे बढ़ता जा रहा है। इस आराम को ही तोड़ने का आह्वान हैं मतदाताओं के प्रश्न। कुछ कातर प्रश्न। कुछ कर्कश प्रश्न। कुछ आहत प्रश्न। कुछ आक्रामक प्रश्न। आज यदि नहीं पूछे तो पांच वर्ष तक अनुत्तरित ही रहेंगे। राजस्थान पर पहला आतंकी हमला आखिर हो कैसे गया? कौन दोषी? दरगाह शरीफ के मुहाने पर धमाके क्यों हुए? जयपुर के गुनहगार गुजरात पुलिस ने पकड़े, अजमेर के दोषी महाराष्ट्र ने। हमने क्यों नहीं?
गोलीकांड के बाद गोलीकांड क्यों हुए? रिफाइनरी क्यों फिसली? हमारी आईआईटी हमारे ही राज्य से बाहर क्यों खुली? महंगाई क्यों नहीं थमी? हर प्रश्न में राज्य सरकार की ओर से उत्तर भाजपा को देना होगा। हर प्रश्न में कांग्रेस को केंद्र सरकार का पक्ष रखना होगा। जहां-जहां केंद्र का विषय नहीं है- वहां-वहां तर्क देने होंगे कि उन्होंने जिम्मेदार, प्रभावी विपक्ष की भूमिका क्यों नहीं निभाई? 81 लाख वोट और 56 सीटें तो उन्हें भी मिली थीं, विधानसभा ठप क्यों नहीं की, जनआंदोलन क्यों नहीं चलाए? प्रश्न क्या-कुछ नहीं कराते! कृष्णा जिले के एक गांव में करोड़ों रु. की लागत से बन रही अपनी एक फिल्म की शूटिंग के दौरान नंदमुरि तारक रामाराव से एक व्यक्ति ने मासूमियत से प्रश्न ही तो पूछा था: ‘हम सब तुम्हें ईश्वर मानते हैं, किंतु तुम हमारे लिए क्या कर रहे हो?’ इस प्रश्न से तीन रातों तक न सो पाए रामाराव ने चौथे दिन तेलगुदेशम पार्टी बनाई और ठीक नौ माह बाद सभी दलों को बुरी तरह पराजित कर सत्तारूढ़ हुए।
हाल ही में हुए अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में ‘जो द प्लम्बर’ का जुमला पूरे समय छाया रहा। ओहियो प्रांत के कारीगर जो ने प्रचार के दौरान बराक ओबामा से प्रश्न पूछा था कि उनकी टैक्स नीति ऐसी क्यों है- जो उसे एक फर्म का मालिक बनने से रोकती है- क्योंकि भारी टैक्स देना होगा। जॉन मैक्केन ने इसे मुद्दा बना लिया- लेकिन ओबामा ने ‘..आराम से मिस्टर जो..सब करेंगे’ कहकर टाला नहीं। उत्तर दिए। संतुष्ट किया।
इतनी दूर क्यों जाएं- हमारे अपने बांसवाड़ा क्षेत्र में पं. जवाहरलाल नेहरू से भरी सभा में एक श्रोता ने जब प्रश्न पूछा कि आप गो हत्या बंद क्यों नहीं करवा पा रहे- तो पुलिस जवान लाठियां मारने दौड़े- पं. नेहरू ने गरजते हुए उन्हें तो रोक लिया किंतु उत्तर न दे सके।
चुनाव में प्रश्नों की लम्बी परम्परा है। इंदिरा गांधी से लालकृष्ण आडवाणी तक सभी प्रश्न सहते रहे हैं, कभी टालते रहे हैं, कभी समाधान देते रहे हैं। जनसंपर्क के दौरान भीड़ चीर कर जो प्रत्याशी से प्रश्न नहीं पूछेगा, वह स्वयं बार-बार निरुत्तर होता रहेगा।