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Chhattisgarh
Raipur Raipur जगदलपुर. बस्तर की जनता ने 61 फीसदी मतदान कर प्रजातंत्र पर भरोसा जताया है। यहां वर्षो से कहर बरपा रहे नक्सलियों को यह करारा जवाब भी है। इस भारी मतदान को लेकर लोग तरह-तरह के कयास लगा रहे हैं। विपक्षी पार्टियां जहां इसे सरकार के खिलाफ मतदान मान रही हैं वहीं सत्तासीन भाजपाइयों का कहना है कि सरकार के सकारात्मक कार्यो का यह परिणाम है।
सच्चाई यह है कि मतदाता अभी भी मौन धारण किए हुए हैं और आठ दिसंबर को आने वाले परिणाम निश्चित रूप से सभी केलिए चौकाने वाले होंगे। यह बात अलग है कि मतदाता सूची में गड़बड़ियों, फोटो परिचय पत्रों के न बन पाने और जुडूम शिविरों के मतदाताओं को मतदान के लिए दी गई अन्य सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पाने के कारण कम से कम 5 फीसदी मतदाताओं को पोलिंग बूथ से निराश लौटना पड़ा। ज्ञातव्य है कि नक्सली संगठनों ने चुनाव बहिष्कार का फरमान जारी किया था।
सारे पूर्वानुमान को तोड़ते हुए बस्तर में हुए भारी मतदान ने प्रदेश ही नहीं देश भर के राजनीतिक प्रेक्षकों के सामने एक सवाल खड़ा कर दिया है। प्रजातंत्र के घोर विरोधी नक्सलियों की क्षेत्र में बढ़ी गतिविधियों और वारदातों के बाद भी आदिवासी बहुल बस्तर के लोगों की प्रजातंत्र पर दृढ़ आस्था ने सभी को चौकाया है। मतदान के पूर्व विभिन्न वामपंथी पार्टियों और मानवाधिकार संगठनों ने यह दावा किया था कि नक्सली आतंक और सलवा जुडूम के कारण केवल दक्षिण बस्तर के ही 200 से ज्यादा गांव खाली हो गए हैं। मतदान के बाद प्राप्त आंकड़ों से इस बात का खुलासा हुआ है कि पूरे बस्तर संभाग में मात्र 55 ही ऐसे पोलिंग बूथ मिले जहां शून्य फीसदी मतदान हुआ।
गौरतलब यह भी है कि ऐसे ही गांवों से नक्सली आतंक से त्रस्त होकर करीब 14 हजार मतदाता विभिन्न जुृडूम शिविरों में रह रहे हैं जहां पोलिंग की अलग व्यवस्था थी। बस्तर में मतदान के दौरान 50 से अधिक जगहों पर नक्सलियों द्वारा की गई फायरिंग, 32 ईवीएम लूटने की घटनाएं और आचार संहिता लागू होने के बाद हुई करीब दर्जन भर हत्याओं के बाद भी इस चुनाव को प्रशासन अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण मान रहा है।
इसका कारण यह है कि पिछले विस चुनाव में अकेले बीजापुर विस में ही ईवीएम लूटने की 35 घटनाएं और संभाग में बारूदी सुरंग विस्फोट की करीब 30 घटनाएं हुई थीं और इतनी ही बारूदी सुरंगों को पुलिस ने बरामद कर नाकाम किया था। इस दौरान कई लोगों की जानें भी गई थीं। जबकि इस बार धुर नक्सल प्रभावित जिला माने जाने वाले नवगठित बीजापुर और नारायणपुर में ईवीएम लूट की एक भी घटना नहीं हुई।
इन सबके बावजूद बस्तर में भारी मतदान का कारण यह नहीं मानना चाहिए कि नक्सलियों के यहां से पैर उखड़ने लगे हैं। सूत्रों पर भरोसा करें तो राज्य में मतदान को प्रभावित करने के लिए यहां पहले से जमे नक्सलियों के अलावाआंध्र प्रदेश, उड़ीसा और अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में नक्सली पहुंचे थे। मतदान के दो दिन पहले ही कोंटा के रास्ते से करीब 400 नक्सलियों के पहुंचने खबर मिली थी। फिर भी जीत बैलेट की हुई। कारण कि चुनाव आयोग ने इस बार सुरक्षा के व्यापक बंदोबस्त किए थे।
पिछले चुनाव की तुलना में तीन गुना ज्यादा फोर्स बस्तर में इस दौरान तैनात थी। प्रशासनिक अधिकारियों ने भी बेहतर सूझबूझ और कार्यकुशलता का परिचय दिया। इससे ज्यादा महत्वपूर्ण था मोर्चे पर तैनात जवान और मतदान कर्मियों का साहस। एक रणनीति के तहत बीजापुर और नारायणपुर जिले में लोकल कर्मियों के ही मतदान दल बनाए गए थे। धुर नक्सल क्षेत्रों के कुछ पोलिंग बूथ में ऐसे मतदाता भी पहुंचे थे जिन्होंने वोट तो दिए लेकिन अंगुलियों में निशान नहीं लगवाया। आशय जाहिर है, अदरूनी क्षेत्रों में लोगों को नक्सलियों का खौफ तो है, लेकिन वे उनके साथ नहीं है।
इस चुनाव में सरकार के खिलाफ माहौल नजर नहीं आया। इसके साथ ही बस्तर के मतदाताओं ने इस चुनाव में प्रत्याशियों को तौल कर वोट देने की दिशा में प्रयास किया है जो उनकी जागरूकता का परिचायक है। मुद्दा विहीन इस चुनाव में महिला मतदाताओं ने भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। चुनाव के नतीजों से राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों के भाग्य का तो निर्धारण होगा ही साथ ही यह भी तय होगा कि बुलेट पर बस्तर में अभी भी बैलेट भारी है।