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नई दिल्ली. केमिस्ट की दुकानों से विटामिन-सी की गोलियां लगभग गायब हो चुकी हैं। दवा बनाने वाली कंपनियां इसका प्रमुख कारण विटामिन-सी के कच्चे माल (बल्क ड्रग) का महंगा आयात बता रही हैं। इसी वजह से उन्होंने अपना उत्पादन घटा दिया है जिससे बाजार में विटामिन-सी की किल्लत हो गई है।
दिल्ली के प्रमुख केमिस्ट नाथ ब्रदर्स के पास पिछले कुछ दिनों से विटामिन-सी की एक भी गोली मौजूद नहीं है। यही हाल एम्स और सफदरजंग अस्पताल के नजदीक स्थित केमिस्ट बीएल एंड कंपनी का भी है। केमिस्टों का कहना है कि कंपनियां करीब दो माह से पर्याप्त आपूर्ति नहीं कर रही हैं और अब हालत यह है कि खासकर सर्दी-जुकाम के समय ज्यादा बिकने वाली विटामिन-सी की गोली की भारी किल्लत हो गई है। ऐसे में अब विटामिन-सी दवा की कीमत में बढ़ोतरी तय नजर आ रही है।
नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथारिटी (एनपीपीए) ने इस विषय पर व्यापक अध्ययन के बाद गुरुवार को यहां बैठक की। आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक बैठक में निर्णय ले लिया गया है जिससे जल्द ही दाम बढ़ा दिए जाएंगे। एनपीपीए के चेयरमैन डा. ए.के.बनर्जी ने त्नबिजनेस भास्करत्न के संपर्क करने पर कुछ भी बताने से मना करते हुए कहा कि जो भी निर्णय लिया गया है उसे तीन-चार दिनों में सार्वजनिक कर दिया जाएगा। यहां स्थित रिटेलर्स एंड डिस्ट्रिब्यूटर्स केमिस्ट एसोसिएशन (आरडीसीए) के अध्यक्ष संदीप नांगिया का कहना है कि विटमिन-सी दवा की किल्लत करीब दो-ढाई माह पहले ही शुरू हो गई थी।
भारतीय दवा उद्योग संघ के कार्यकारी निदेशक गजानंद वाकंकर का कहना है कि चीन से आयातित बल्क ड्रग (एस्कार्बिक एसिड) के दाम पिछले कुछ महीने में तेजी से बढ़े हैं, जबकि उस अनुपात में भारत में इसकी दवा के दाम नहीं बढ़े हैं। इससे कंपनियां विटामिन-सी की गोलियां बनाने और अन्य दवाओं में एस्कार्बिक एसिड डालने से बच रही है। चीन से आयातित बल्क ड्रग का दाम मई 2007 में करीब 4.4 डॉलर प्रति किलोग्राम था जो अब बढ़कर 12 डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है।
असल में विटामिन-सी के दाम ड्रग प्राइस कंट्रोल आर्डर (डीपीसीओ) के अंतर्गत तय होते हैं। सरकार द्वारा तय किए गए दाम से ऊपर कीमत पर विटामिन-सी बेचना गैरकानूनी है। अगर किसी मल्टी विटामिन दवा में भी विटामिन-सी का घटक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है तो उस पर भी डीपीसीओ के नियम लागू होते हैं। विश्व में एस्कार्बिक एसिड का मुख्य आपूर्तिकर्ता चीन है, जिसने ओलंपिक के दौरान पर्यावरण सुरक्षा के कारण कड़े कानून बनाए गए थे।
इससे निवेश लागत बढ़ गई जिससे कई कंपनियां तो बंद ही हो गई हैं। उधर, बाकी बची कंपनियों ने इसी बहाने एस्कार्बिक एसिड के दाम बढ़ा दिए हैं। फार्मा उद्योग के सूत्रों का कहना है कि कंपनियों ने इसी कारण को मुख्य आधार बनाते हुए उत्पादन घटा दिया है जिससे कि सरकार पर दबाव बनाया जा सके। अब कंपनियां अपने इस मकसद में कामयाब होती दिख रही हैं। इस मसले पर संपर्क करने पर फार्मा कंपनियों ने बात करने से मना कर दिया।